आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

नारी के प्रति कृतज्ञता.

                
                                                         
                            मैं गुमान करूं कैसे , मुझे ठीक से नारी की पहचान हीं है ।
                                                                 
                            

मेरा अंधकार है गहरा , मुझे अनुभूति का ज्ञान नहीं है ,
जो पीड़ा तुमने भोगी है , मुझे उसका अनुमान नहीं है !
पीड़ा से सृजन होता , तेरी पीड़ा का मुझे भान नहीं है ,
मैं ये बात बताऊँ कैसे , पर-पीड़ा का मुझे ज्ञान नहीं है !
मैं गुमान करूं कैसे , मुझे ठीक से नारी की पहचान नही है ।

भ्रूण हत्या क्यूँ करता , क्यों कि- मैंने पीड़ा नहीं भोगी है ,
मूर्ख हूं मैं, मुझे नहीं पता, संसार की रचना कैसे होती है !
संतुलन रखने हेतु , प्रकृति विधि का , मुझे ज्ञान नहीं है ,
तुझे मिटा के स्वयं मिटूंगा , मुझे इसका अनुमान नहीं है 

मैं गुमान करूं कैसे , मुझे ठीक से नारी की पहचान नहीं है ।
तुम चट्टान सी दिखती हो , पर अनुभव तुम्हारा गहरा है ,
जो चट्टान तोड़ के राह बनाती , तू जल की वह धारा है !
हरे तृण से भी अति-कोमल , करुणा भरा प्यार तुम्हारा है ,
शास्त्रों ने जिसे नरक कहा , इस असत्य का भान नहीं है !
मैं गुमान करूं कैसे , मुझे ठीक से नारी की पहचान नहीं है ।

– अजय शोभने.
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर