संध्या की इस गोधूली में, बाबा साहब याद आपकी आ जाती है ,
कितना भी रोकूँ इस हृदय को, पर नयनों की गागरभर जाती है ।
'जातिवाद' से लड़ने की , ऐसी वो अमिट कहानी है ,
संघर्षों की वेदी पर बलि कर दी , वह 'जिंदगानी' है !
युगों-युगों तक याद रहेगी , तेरी मूल-मंत्र सी वाणी है ,
आज हवा बह बह के कहती , बड़ी संघर्ष भरी कहानी है
संध्या की इस गोधूली में, बाबा साहब याद आपकी आ जाती है ,
कितना भी रोकूँ इस हृदय को, पर नयनों की गागर भ जाती है !
'मूल निवासी बहुजनों' की , घनी निशा के चन्द्र आप हैं ,
'भारतीय संविधान' के , स्वर्णिम वैभव-जनक आप हैं !
विश्व-ज्ञानी विधिवेत्ताओं में , सौरमंडल के सूर्य आप हैं ,
हिमालय से भी ऊंची , बाबा साहब की गौरवमयी कहानी है
संध्या की इस गोधूली में, बाबा साहब याद आपकी आ जाती है ,
कितना भी रोकूँ इस हृदय को, पर नयनों की गागरभर जाती है !
हवा से विमुख हो , देखो वो , तूफानों से खेल गये हैं ,
मानसरोवर के हंसों में , वो परमहंस बन तैर गये हैं !
समता स्थापित कर , बुद्ध के वे बोधिसत्व हो गये हैं ,
सागर से भी गहरी , बाबा साहब तेरी अमिट कहानी है
संध्या की इस गोधूली में, बाबा साहब याद आपकी आ जाती है ,
कितना भी रोकूँ इस हृदय को, पर नयनों की गागरभर जाती है !
अंधकार भरे इस देश के , वो प्रकाशपुंज हो गये हैं ,
बेसहारों के सहारा बन , वो जगत मसीहा हो गये हैं !
भारतरत्न फीका पड़ गया , वो विश्वरत्न हो गये हैं ,
विश्व ज्ञान दिवस पर , करुणामय की अमर कहानी है !
संध्या की इस गोधूली में, बाबा साहब याद आपकी आ जाती है ,
कितना भी रोकूँ इस हृदय को, पर नयनों की गागर भर जाती है !
– अजय शोभने