सतरंगी रंगों का मेला, फिर आया फागुन चित्तचोर,
सखियों संग करे हंसी ठिठोली, कान्हा माखन चोर।
बरसाने की होली में फगिया अंगिया रही भिगोर,
सखा-सखी, छोटे बडे़, प्रेम-सुधा-सुगंध-बिभोर।
गली गली में घूमे, हुरियारों की रंग विरंगी टोली,
जीजा-साली, देवर-भाभी, हंसी-ठिठोली-पुरजोर।
भंग छनी पी पी कर रसिया, स्वांग करे घनघोर,
टेसू-सुगंध फ़ना हुये, केमिकल के रंगों का जोर।
घर-घर में कांजी वरे, गुंझिया स्वादिष्ट पकवान बने,
दही-पकौड़ी,पापड़-कचरी, करे मेहमान बिभोर।
रसिया के दंगल में द्वयार्थी मद-हास्य-परिहास,
कवियों ने पढ़े छंद-व्यंग्य-विनोद-हास-परिहास।
आह ! पीछे क्यों छूट रही है परम्पराएं मनुहारी,
गिले शिकवे दूर करने की फिर से करो तैयारी।
आओ हम सब मिलकर फिर से रसधार बहायें,
होली मिलन कायम रख,समरसता जग फैलायें।
फिर घर-घर पुष्प बसंत खिले, गूंजे राग-मलहार-बिभोर,
घट-घट में मस्ती व्यापे, अजेय गुलाल-अम्वीर चित्तचोर।
- अजय 'अजेय'
घुघंरू नगरी भारत
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