पनघट पर मुझे छेड़े
कन्हैया नट-नागर ।
कंकड़ काहे मारे
भरल जल गागर ।
भींगे मन मोर
भींगे मोर सारी ।
यशोदा तेरा लला
नहीं अब अनारी ।
ब्रज की यह रीति
अद्भुत न, निराली ।
छेड़े सब सखियां
बोले बारी-बारी ।
मुरली कभी टेरत
कभी हेरत यारी ।
नटखट बहुत तेरा
यशोदा बनवारी ।
श्याम सलोने की
कीर्ति ही निराली ।
हिया मोर चुराए
वृंदावन बिहारी ।
-अजातशत्रु सिंह