आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पनघट पर मुझे छेड़े

                
                                                         
                            पनघट पर मुझे छेड़े
                                                                 
                            
कन्हैया नट-नागर ।
कंकड़ काहे मारे
भरल जल गागर ।

भींगे मन मोर
भींगे मोर सारी ।
यशोदा तेरा लला
नहीं अब अनारी ।

ब्रज की यह रीति
अद्भुत न, निराली ।
छेड़े सब सखियां
बोले बारी-बारी ।

मुरली कभी टेरत
कभी हेरत यारी ।
नटखट बहुत तेरा
यशोदा बनवारी ।

श्याम सलोने की
कीर्ति ही निराली ।
हिया मोर चुराए
वृंदावन बिहारी ।
-अजातशत्रु सिंह
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर