झूठा प्रेम न गाया कर,
गलत राह न जाया कर,
सच में कोई मिल जाए,
तो आ के मुझे बताया कर।
विचार कर बोलना,
लपेटा माल न खोलना,
मन भर पेले जाओगे,
सोच समझकर बोलना।।
हर किसी के बस का रोग नहीं।
भोग सरल है योग नहीं।।
राजा निगेश समझो बात,
हर किसी को शायरी का जोग नहीं।।
मनय मन मुन्नका,मनय मन चुहारा।
किसी को न भाया वचन है हमारा।।
क्या बोलूं इस संवाद को,
मनोहर वाद विवाद को,
चलती आधी रात को,
चुकी बैटरी साथ को,
निगेश के जज़्बात को,
आयुष के खेल दिमाग़ को।
अजय के नीद राग को।
आदित्य के काव्य विधान को।।
नमन रात के चांद को।
शुभरात्रि मित्रों अब आपको।
आई०टी०आई० की बात है,
काम बहुत दिन रात है।
यादें मेहनत, दिमाग सब,
दे रहे जोर से साथ है।
सच है,न आयुष भाई,
मुख्य यही बात है।।
-आदित्य दाहिया