जिंदगी तू अंतिम सांस तक साथ है मेरे
ये मेरा भ्रम है जिसे मैंने अकेलापन कहा
एक दुनिया बसी है मेरे और तेरे दरम्यान
हम दोनों कितने मशरूफ़ रहते है
बात नही होती हमारी सदियों तक
जिंदगी फिर भी तू अंतिम सांस तक साथ है मेरे
ये मेरा भ्रम है जिसे मैंने अकेला पन कहा
सफर तमाम तेरे साथ किया करते हैं
क्या हुआ हम अगर गुमसुम से रहा करते हैं
फर्क पड़ता है जुदाई की अगर बात चले
दो किनारे ही सही तू भी मेरे साथ रहे
गमो गुस्सा है मुझे और हैं कितने शिकायत तेरे
जिंदगी फिर भी तू अंतिम सांस तक साथ है मेरे
ये मेरा भ्रम है जिसे मैंने अकेला पन कहा
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।