बचपन की वो छोटी-सी दुनिया,
छोड़कर बड़ा बनने का
बड़ा शौक था ना...
अपने पैरों पर खड़ा होने का।
तब लगता था—
बड़े होंगे तो आज़ाद होंगे,
जो मन करेगा, वही करेंगे।
कहाँ पता था तब,
बड़ा होना आज़ादी नहीं,
ज़िम्मेदारियों में जीना है,
बेख़याली नहीं।
खेलने की जगह काम होगा,
फिर खिलौनों की जगह
ज़रूरतें आ जाएँगी।
और “क्यों?” पूछने वाली उम्र
“क्यों नहीं?” समझाने में
बीत जाएगी।
बचपन में खिलौने टूटते थे,
तो रोकर माँ से कह देते थे।
अब रिश्ते टूटते हैं,
तो कुछ अपने भी
छूट जाते हैं।
तब चोट लगती थी,
तो माँ की गोद
मरहम बन जाती थी।
आज दिल दुखता है,
तो “कुछ नहीं हुआ...”
कहकर मुस्कुराना पड़ता है।
बहुत सारी खुशियाँ मिल जाती थीं
तब थोड़े-से पैसों में,
आज बहुत कुछ मिलकर भी
दिल नहीं है सुकून में।
काश...
आज फिर वो बचपन मिल जाए,
तो उससे कोई सवाल नहीं करूँगा।
बस उसका हाथ पकड़कर
धीरे से कहूँगा—
“चल...
जहाँ से आए थे,
वहीं लौट चलते हैं।
इस बार
जल्दी बड़ा होने का
शौक नहीं पालते हैं...”
- अभिषेक द्विवेदी 'नीरज'