न जाने क्यों मन को अब घृणा भी प्यारी लगती है,
पता नहीं यह हकीकत है या कोई स्वप्न सा खिंचती है।
कितना अगाध यह प्रेम है,
जिसमें कोई चाह नहीं,
सुंदर है,
चंचल है बेहद,
पर छल की कोई राह नहीं।
गुम हो जाता हूं,
किसी के प्रेम में,
कभी- कभी मिलने से,
भी डरता हूं।
समंद्र कहता है,
लहरों से लिपट,
जाने दे कहानी तू आ,
समंद्र से लिपट।