हौले हौले से ये घरौंदा बनाया हमने
उम्मीद की तस्वीरों से उसे सजाया हमने
न अपने को उठाया न किसी को गिराया
काटी खामोशी और ख़ुशी से उम्र हमने
मुद्दे बहुत आये सामने पहाड़ बनकर
पर सर हमेशा ऊँचा उठाए रखा हमने
न रो कर न हँस कर किसी को पिलाया
मुसलसल पिया ख़ुद ही ज़हर हमने
कभी खाई चोट तो न ज़ाहिर की किसी पर
न साझा किए किसी से मिले जो ज़ख़्म हमने
एक मुट्ठी रेत लेकर निकला था साथ अपने
लम्हा दर लम्हा बनाया एक शहर हमने
-अभय ‘अवधी’