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भर रहा था हर कोई दम आशिक़ी का

Abdulsalam sardhanvi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            भर रहा था हर कोई दम आशिक़ी का
        
                                                    
                            
क्यूं अदीबों क्या हुआ है शायरी का

ऐब औरों के तुझे दिखते बहुत हैं
बन मुहासिब तू कभी अपनी कमी का

दूसरों के दर्दों ग़म महसूस कर लो
हम सभी को है ख़याल अपनी ख़ुशी का

नेकियों की एक गठड़ी भी नहीं है
फ़ायदा कुछ तो उठा लो ज़िंदगी का

तीरगी में रौशनी दिखलाएगा वो
छोड़ भी दो अब इरादा खुदकुशी का

लौट कर जाएंगे हम सब जिसकी जानिब
नाम लिखना अपने दिल पर बस उसी का

पाक रख गोशा ए दिल आज़िम हमेशा
इस तरह से हक़ अदा कर बंदगी का
-अब्दुल सलाम
5 महीने पहले
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