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भर रहा था हर कोई दम आशिक़ी का

Abdulsalam sardhanvi

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                            भर रहा था हर कोई दम आशिक़ी का
        
                                                    
                            
क्यूं अदीबों क्या हुआ है शायरी का

ऐब औरों के तुझे दिखते बहुत हैं
बन मुहासिब तू कभी अपनी कमी का

दूसरों के दर्दों ग़म महसूस कर लो
हम सभी को है ख़याल अपनी ख़ुशी का

नेकियों की एक गठड़ी भी नहीं है
फ़ायदा कुछ तो उठा लो ज़िंदगी का

तीरगी में रौशनी दिखलाएगा वो
छोड़ भी दो अब इरादा खुदकुशी का

लौट कर जाएंगे हम सब जिसकी जानिब
नाम लिखना अपने दिल पर बस उसी का

पाक रख गोशा ए दिल आज़िम हमेशा
इस तरह से हक़ अदा कर बंदगी का
-अब्दुल सलाम
3 महीने पहले
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Deepak Sharma

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