निश्चित ही प्रिय मन मुझको,
मेरा गाँव बुला रहा है।
कोई आहट सी मन धीर धरे,
कुंठित बन झुंझला रहा है ।
ख्वाईसों की दुम पकड़ के,
क्यूँ इतना इठला रहा है।
तू मन को मन खुद तुझको,
वेबस बस तू रुला रहा है।
निश्चित ही प्रिय मन मुझको, मेरा गाँव बुला रहा है ॥
कहता दिनकर तेरे शहर में,
दूर तक कोई दरख्त नहीं ।
मेरे गाँव में झुरमुट तरु की,
लम्बा सफर है सख्त नहीं।
मन उदास चलने को व्याकुल,
पर जाने का वक्त नहीं।
सुना है अबके मेरे गाँव तक,
कोई सड़क जा रहा है।
निश्चित ही प्रिय मन मुझको, मेरा गाँव बुला रहा है ॥
कहता पनघट आ भी जा कभि,
मृदुजल पीने के खातिर ।
तुझे शहर की हवा लगी क्या,
बना तु इतना क्यूँ सातिर।
गाँव कि रौनक बस्ती अलहड़,
दृग मन का तेरे शाकिर ।
सावनकि झड़ी में झरता झरना,
यादों में कुछ गा रहा है।
निश्चित ही प्रिय मन मुझको, मेरा गाँव बुला रहा है ॥
दूर शहर में ऋतु बदले तो,
तूने कब पहचानी है।
हल्की फुहार बरसी नहीं कि,
कीचड़ कीचड़ पानी है।
मेरे गाँव ने रुत को परखा,
यहाँ नियति बड़ी सयानी है।
अब की हिमऋतु तुषार धवला,
आगोश में धरती सुला रहा है।
निश्चित ही प्रिय मन मुझको, मेरा गाँव बुला रहा है ॥
-पपेन्द्र सिंह धिरवाण