ये ज़ुल्फ़ अगर खुल के बिखर जाए तो अच्छा,
इस रात की तक़दीर सँवर जाए तो अच्छा।
कुछ चाँद उतर आए तेरी आँखों के तले,
कुछ रात तेरी आँखों में ठहर जाए तो अच्छा।
ये चाँद भी आज कुछ ज़्यादा ही हसीं है,
तेरा चेहरा इसके सामने निखर जाए तो अच्छा।
ख़ामोश हैं लब, फिर भी बहुत कुछ है कहने को,
कोई बात तेरी आँखों से उतर जाए तो अच्छा।
यूँ तो ये फ़ासले भी अच्छे हैं मगर,
एक शाम मेरे पास तू गुज़र जाए तो अच्छा।
न शिकवा रहे कोई, न कोई बात अधूरी,
ये रात तेरे साथ ही ढल जाए तो अच्छा।
और फिर सुबह जब हो, तो इतना सा हो कमाल—
तेरी ज़ुल्फ़ों की ख़ुशबू मेरे ख़्वाबों में ठहर जाए तो अच्छा।