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शायद इसी को सुकून कहते हैं—

Aakash Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी-कभी सफ़र में
        
                                                    
                            
मंज़िल से ज़्यादा ज़रूरी होता है
एक ऐसा ठिकाना,
जहाँ कुछ पल के लिए
मन को रास्तों से छुट्टी मिल सके।

जहाँ खिड़की के पार
शहर चलता रहे,
और भीतर बैठा मुसाफ़िर
थोड़ी देर
अपने ही ख़यालों में ठहर सके।

कुछ बातें अधूरी रहें,
कुछ ख़ामोशियाँ पूरी हों,
कुछ पल गुज़र जाएँ
बिना किसी वजह के…

फिर वही रास्ते,
वही सफ़र,
वही अनजान शहर—
मगर मुसाफ़िर थोड़ा बदल चुका हो।

शायद इसी को सुकून कहते हैं—
जब कहीं पहुँचना ज़रूरी न हो,
बस कुछ देर ठहरना ही
काफ़ी लगे।

मुसाफ़िर कैफ़े—
एक जगह नहीं,
सफ़र के बीच मिला
वो छोटा-सा सुकून है।

 
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