आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

शायद इसी को सुकून कहते हैं—

                
                                                         
                            कभी-कभी सफ़र में
                                                                 
                            
मंज़िल से ज़्यादा ज़रूरी होता है
एक ऐसा ठिकाना,
जहाँ कुछ पल के लिए
मन को रास्तों से छुट्टी मिल सके।

जहाँ खिड़की के पार
शहर चलता रहे,
और भीतर बैठा मुसाफ़िर
थोड़ी देर
अपने ही ख़यालों में ठहर सके।

कुछ बातें अधूरी रहें,
कुछ ख़ामोशियाँ पूरी हों,
कुछ पल गुज़र जाएँ
बिना किसी वजह के…

फिर वही रास्ते,
वही सफ़र,
वही अनजान शहर—
मगर मुसाफ़िर थोड़ा बदल चुका हो।

शायद इसी को सुकून कहते हैं—
जब कहीं पहुँचना ज़रूरी न हो,
बस कुछ देर ठहरना ही
काफ़ी लगे।

मुसाफ़िर कैफ़े—
एक जगह नहीं,
सफ़र के बीच मिला
वो छोटा-सा सुकून है।

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर