बीच चौराहे लाके उसने, खड़ा कर दिया
मुजरिम हूँ मैं महोब्बत में,ये फतवा कर दिया
न हूँ मैं आज़ाद न मिली सजा यारो
ये कोनसा मैंने इतना संगीन जुर्म कर दिया
हम छोड़ के सब कुछ बैठे थे ,तेरे दर पे आके जो
तेरे दर के थे दरबान क्यों दर-ब-दर कर दिया
कोई कहे उसे जाकर ओह ज़ालिम ऐसा नहीं करते
जशन -ए -बहारा आदम क्यों इतना तनहा कर दिया
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