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विभाजन का दंश

आचार्य प्रवेश कुमार धानका

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हवा मिली फिरंगी से जब, नफ़रत की इमारत को,
        
                                                    
                            
मज़हब ने झुलसाया था, सदियों की शराफ़त को।
कुर्सी की वह जंग खा गई, वीरों की शहादत को,
जिन्ना तेरी ज़िद ले डूबी, मेरे प्यारे भारत को!
अरे, जिन्ना तेरी ज़िद ले डूबी, मेरे प्यारे भारत को!

छूट गया वह आँगन सबका, छूटी पुरखों की ज़मीन,
रातों-रात हुए बेघर सब, आँखें सबकी हुईं नमकीन।
पैदल ही कारवाँ चल पड़े, सहते भारी आफ़त को,
जिन्ना तेरी ज़िद ले डूबी, मेरे प्यारे भारत को!
अरे, जिन्ना तेरी ज़िद ले डूबी, मेरे प्यारे भारत को!

जो पड़ोसी कल तक अपने थे, हाथों में ख़ंजर आ गए,
प्यार-मोहब्बत भूल के सारे, नफ़रत के बादल छा गए।
साझी संस्कृति टूट गई सब, सहकर इस आघात को,
जिन्ना तेरी ज़िद ले डूबी, मेरे प्यारे भारत को!
अरे, जिन्ना तेरी ज़िद ले डूबी, मेरे प्यारे भारत को!

चीख उठी थी रूह वतन की, काँप उठा था अंबर भी,
बहनों की अस्मत लूटी थी, रोया था हर पत्थर भी।
मासूमों की आबरू बिखरी, सहते इस आफ़त को,
जिन्ना तेरी ज़िद ले डूबी, मेरे प्यारे भारत को!
अरे, जिन्ना तेरी ज़िद ले डूबी, मेरे प्यारे भारत को!

महलों के राजा पल भर में, टेंटों के अंदर आ सोए,
लाखों लाशें बिछीं राह में, अपनों को खोकर सब रोए।
खून से लथपथ आईं ट्रेनें, दर्शातीं इस आफ़त को,
जिन्ना तेरी ज़िद ले डूबी, मेरे प्यारे भारत को!
अरे, जिन्ना तेरी ज़िद ले डूबी, मेरे प्यारे भारत को!

रेडक्लिफ़ की अंधी रेखा, ऐसा गहरा ज़ख़्म दे गई,
आज़ादी की पावन बेला, खुशियाँ सारी छीन ले गई।
सुलगे जो विवाद कश्मीर का, सहते इस आघात को,
जिन्ना तेरी ज़िद ले डूबी, मेरे प्यारे भारत को!
अरे, जिन्ना तेरी ज़िद ले डूबी, मेरे प्यारे भारत को!

 
एक दिन पहले
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