योगेंद्र वर्मा व्योम उन रचनाकारों में से हैं जिन्होंने कविता से अपना साहित्यिक सफ़र शुरू किया और फिर नवगीत के आकर्षण में बंध कर नवगीत की तरफ आ गए। नवगीत की तरफ वो रचनाकार ही आता है जिसे बेड़ियां तोड़ने की ख्वाहिश होती है, जो बंधे-बंधाए और कहे-कहाए लहजों में घुटन महसूस करता है, जो अपनी अलग राह निकालना चाहता है, अपनी बात नए ढंग और नए रंग में कहना चाहता है, अपने लहजे को दूसरे लहजों से अलग करके ताज़गी पैदा करना चाहता है और सबसे बड़ी बात - जो परिवर्तन लाना चाहता है। कहने और सुनने में जिस कवि को नये-पन की तलाश होती है, वह नवगीत की तरफ मुड़ जाता है और नवगीत भी उसे बाहें फैलाकर अपनी गोद में समा लेता है।
व्योम जी की परवरिश, उनकी रचनाओं उनके गीतों में साफ़ दिखाई देती है। वो रिश्तों की पासदारी में यकीन रखते हैं। रिश्तों को निभाना चाहते हैं। आख़िरी दम तक रिश्ते तोड़ना नहीं चाहते। तभी तो अपनी नवगीतों की किताब का नाम उन्होंने 'रिश्ते बने रहें' रखा। यानी कितना भी बुरा समय आए, कितनी भी दिलों में खटास पैदा हो, कितना भी इस शीशे में बाल आए, मगर रिश्ते बने रहें।
यह रिश्ता केवल दो इंसानों के बीच, दो परिवारों के बीच या दो पड़ोसियों के बीच का नहीं है। यह रिश्ता है इंसान का इंसान से, उस इंसान का भी दूसरे इंसान से जिसने एक दूसरे को कभी देखा नहीं, एक दूसरे से बात तक नहीं की। लेकिन रिश्ता सुख बांटने का और दुख बांटने का, मुश्किल समय में साथ खड़े होने का, परेशानी में हाथ थामने का उनके बीच बना रहे। यही रिश्ता तो गुज़रते हुए वक़्त के साथ कमज़ोर होता जा रहा है। इसी कमज़ोरी को मज़बूती में बदलने की ख्वाहिश व्योम जी के यहां ख़ूब नज़र आती है।
व्योम जी की एक और बड़ी ख़ासियत यह है कि वो सुनना जानते हैं और जो सुनते हैं उसे संजोना भी जानते हैं। यही सबब है कि उन्होंने अपने वरिष्ठ रचना कारों को खूब सुना भी है, उनसे सवाल भी किए हैं, जवाब भी हासिल किए हैं और उन जवाबों को एक दस्तावेज़ की शक्ल में जमा भी किया है, जो उनकी मशहूर किताब 'बात बोलेगी' नाम से हम सब के सामने आयी है। 'बात बोलेगी' अपने समय के बड़े गीतकारों के साक्षात्कारों का संकलन है जो अपने आप में नायाब इसलिए है कि इस समय के जितने भी बड़े नाम हैं गीत के मामले में और नवगीत के मामले में, इस संकलन में एक जगह इकट्ठे किये हुए हैं।
योगेंद्र वर्मा व्योम अपने संस्कार और अपनी परंपराओं से जुड़े हुए गीतकार हैं। उन्हें गुज़रे समय पर और अपने बुज़ुर्गों पर नाज़ है। रिश्तों की गर्माहट को वो अपना सरमाया समझते हैं। यही कारण है कि नए दौर में इस इंटरनेट युग में, जहां सभी इस इंटरनेट के जाल में उलझे हुए हैं, जहां आपस की समझदारी और रिश्तों की ज़िम्मेदारी कहीं गुम हो गई है। यह दुख उनके गीतों में अक्सर नज़र आ जाता है। एक गीत में कहते हैं-
गूगल युग में परंपराएं
गुम हो गईं कहीं
संस्कार भी पोस्ट-कार्ड से
दिखते कहीं नहीं
बीते कल से रोज़ आज की
रहती अनबन है....
यह अनबन जिसे आम ज़बान में जेनेरेशन-गैप कहकर हंसी में टाल दिया जाता है, कैसे रिश्तों को और पीढ़ियों को दीमक की तरह खाकर एक दूसरे से अलग कर रही है। यह वही समझ सकता है जिसके मन में जोड़ने का भाव हो। जो सिर्फ जोड़ने में यक़ीन रखता हो। व्योम जी जोड़ने में यक़ीन रखते हैं। तभी तो वो एक गीत में कहते हैं-
एक समय था, आदर पाते
ख़ूब चहकते थे
जिनकी ख़ुशबू से हम तुम सब
रोज़ महकते थे
लगता है अब रूठ गए हैं
घर आंगन के शब्द...
घर आंगन के शब्दों का रूठना यानी घर-आंगन सूना हो जाना, किस मर्म के साथ दर्शाया गया है। यहां घर और आंगन, घर वालों और रहने वालों से ख़ाली हो जाने के कारण नहीं है। घर-आंगन उसी तरह से भरे हुए हैं। लेकिन हर व्यक्ति इतना एकांत-प्रिय और एकाकी हो गया है कि उसे अपने ही घर में किसी से बात करने की, किसी की बात सुनने की न तो ख़्वाहिश है और न ही फ़ुरसत है।
संयुक्त परिवार को तो छोड़ ही दीजिए एकल परिवार भी अब अपना वजूद खोते जा रहे हैं। आदमी वक़्त के साथ और तन्हा होता जा रहा है। इसी एकाकीपन का, इसी तन्हाई का दुख उनके गीत, जिसमें कॉलोनी में रहने वालों की मनोदशा को दिखाया गया है, में व्योम जी कहते हैं-
महानगर की दौड़-धूप में
उलझी खुशहाली
जैसे गमलों में ही सिमटी
जग की हरियाली
गुमसुम ढाई आखर जैसे
कॉलोनी के लोग...
इसमें 'गुमसुम' लफ़्ज़ है जिसमें सबकुछ समाया हुआ है। यह गुमसुम क्यों है। इसके पीछे वजह वही है कि हम अपनी जड़ों को छोड़ चुके हैं। हम अपनी जड़ों से कट चुके हैं। इसीलिए हम अलग-अलग पत्तों की तरह बिखर गए हैं।
ये नवगीत समाज को आईना दिखाने वाले और समाज का आईना बनने वाले गीत हैं। गीतों की भाषा आम भाषा है जिसमें हिंदी और उर्दू के मिले-जुले लफ़्ज़, जिन्हें हम हिंदुस्तानी ज़बान के लफ़्ज़ कहते हैं वो ज़्यादा इस्तेमाल किए गए हैं। लफ़्ज़ों में भाव को इस तरह बांधा गया है कि उनमें बहाव बोझिल नहीं होता, बल्कि पंक्तियां बहुत आसानी से ज़बान पर बहती हुई नज़र आती हैं। ऐसे शब्द न के बराबर इस्तेमाल किए गए हैं कि जिनका अर्थ अपने आप से पूछना पड़ता हो। लेकिन इन गीतों में एक कमी नज़रआती है वो यह कि अधिकतर गीतों का मीटर केवल एक ही है।
जो ज़ाहिर बात है व्योम जी का प्रिय मीटर होगा, प्रिय छंद होगा। लेकिन इससे रचना की विविधता में एक बाधा सी महसूस होती है। एक गीत से दूसरे गीत की तरफ आते हुए पाठक मन को विविधता की कमी महसूस होती है। जब हम किसी रचना को पढ़ते हैं तो उस रचना का जो छंद विधान है। उसका एक जादू होता है, एक घेरा होता है, जिसने हमें घेरा हुआ होता है। हर छंद या मीटर का अलग जादू और अलग बन्दिश होती है। एक रचना जब दूसरी रचना से अलग छंद विस्तार में या बह्र में होती है तो पाठक इसमें जकड़े जाने और फिर छूटे जाने में जो अनुभव करता है उससे रचना अलग ही प्रभाव छोड़ती है। जिसकी कमी मुझे व्योम जी के यहां महसूस होती है।
व्योम जी ने पिछले एक डेढ़ दशक में नवगीत में जिस तरह अपनी रचना-धर्मिता और अपने गीतों से नवगीत के संजीदा पाठकों, श्रोताओं और अन्य नवगीतकारों में अपनी महत्वपूर्ण पहचान बनाई है उसे देख कर खुशी होती है। यह आसान काम नहीं है, वो भी कम समय में। यहां एक बात मैं कहना चाहता हूं कि नवगीत होने के बावजूद इन गीतों में जो गहराई, जो ठहराव और शब्दों के चयन और उनका पंक्ति में फैलाने का जो सलीक़ा है, वह किसी भी तरह इन नवगीतों को परंपरागत गीत के स्तर से कम नहीं होने देता।
वरना आजकल नवगीत के नाम पर क्या कुछ लिखा जा रहा है उसे बताने की ज़रूरत नहीं है। अगर नवगीत को इसी तरह व्योम जी जैसे ठहरे हुए, सुलझे हुए और अपने आप को गहराई तक जाने जानने वाले, रिश्तों को पहचानने वाले गीतकार मिलते रहे तो नवगीत में और गहराई और पैनापन आएगा।
योगेंद्र वर्मा व्योम मुरादाबाद के गीत के आने वाले वक़्त के एक बड़े नाम होने वाले हैं। यह मैं पूरे यक़ीन के साथ कह सकता हूं।
एक वर्ष पहले