जाने माने संगीतकार ख़य्याम ने हिंदी फिल्मी दुनिया में कभी-कभी, बाज़ार, उमराव जान, रज़िया सुल्तान, नूरी, त्रिशूल, आहिस्ता आहिस्ता, दिल-ए-नादान, रजिया सुल्तान, हीर रांझा जैसी फिल्मों में अपनी बेजोड़ संगीत कला से अन्य संगीतकारों के लिए रूह और रूबाइयत का नया रास्ता तैयार किया। ख़्य्याम के संगीत में एक पाक रूह की खूश्बू है। रोमानियत एक अजीब सी महक लिए हुए है।
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1927 में ख़य्याम का जन्म हुआ और 10 साल की उम्र में ही घर छोड़कर दिल्ली आ गए।अभिनेता बनने का सपना उन्हें दिल्ली ले आया पर किस्मत को कुछ और मंजूर था । दिल्ली में 5 साल रहते हुए उन्होंने संगीत सीखा और अपनी किस्मत आजमाने के लिए बम्बई चले गए।
रजिया सुल्तान में उन्होंने जो संगीत की पाकीजगी पेश की है वह अन्यत्र और कहीं नहीं मिलती। इस फिल्म की वजह से मैं ख़य्याम साहब का मुरीद हो गया था। इस फिल्म ने संगीत को सूफी टच दिया। धीमे धीमे घुंघरुओं की झंकार और ढोलक की थाप ने जैसे लोगों को रुकने पर मजबूर कर दिया।
कभी कभी का मैं पल दो पल का शायर हूं गीत साहिर लुधियानवी ने लिखा था। इस गीत में संगीत ख़य्याम ने दिया। साहिर का दर्शन और रूमानियत इस गीत में साफ तौर पर झलकता है । इसी फिल्म के अन्य गीतों को जब ख़य्याम का संगीत मिला तो ऐसा लगा कि प्यार की राह में जुदा हुए लागों को एक सहारा मिल गया।
1981 में फिल्म उमराव जान के गीतों में खय्याम साहब ने अपना तरन्नुम दिया। अभिनेत्री रेखा को इस फिल्म में नया मुकाम मिला। इसके संगीत के लिए खय्याम ने काफी मेहनत की । इस फिल्म के गीतों को आशा भोसले ने गाया था। उमराव जान के ही ये गीत आज भी प्यार करने वालों को हौसला और हिम्मत दे रहे हैं।
मशहूर संगीतकार खय्याम का 92 वर्ष की उम्र में मुम्बई में 19 अगस्त 2019 को निधन हो गया । 1947 में अपना कैरियर शुरू करने के बाद खय्याम ने कभी पीछे मुड़ के नहीं देखा । बॉलीवुड के सभी संगीतकार नौशाद हो या शंकर जयकिशन सभी उनके फंकार के मुरीद थे ।
1983 की फिल्म रजिया सुल्तान के गीत ए-दिले नादान खय्याम के संगीत की वजह से खूब हिट हुआ। इस गीत का संगीत अलग तरीके का है । धीमे धीमे संगीत में खय्याम ने इसमें कई प्रयोग किए। घुंघरुओं और ढोलक की थाप इस गीत की पहचान है। जो सीधे सीधे रूह पर असर करती है।