महिलाओं पर ये हैं 18 बड़े शेर...रौनके़ं जितनी यहां हैं औरतों के दम से हैं...

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली Updated Wed, 07 Mar 2018 08:44 PM IST
women's day shayari
समाज की पुरुष-प्रधान मान्यताओं को बीते कई दशकों से महिलाओं ने चुनौती देते हुए हर क्षेत्र में स्वयं को स्थापित किया है। कई उदाहरण ऐसे भी देखने को मिलते हैं जहाँ पुरुषों ने भी महिला विरोधी रूढ़ियों का विरोध किया और उनके समान अधिकारों की बात की। यहाँ कुछ ऐसे ही शेर मौजूद हैं जिनमें महिलाओं ने तो अपने हक़ों की आवाज़ उठाई ही है साथ ही पुरुषों ने भी उनके महत्व को समझाया है। 

शहर का तब्दील होना शाद रहना और उदास  रौनके़ं जितनी यहां हैं औरतों के दम से हैं  - मुनीर नियाज़ी कौन बदन से आगे देखे औरत को  सबकी आँखें गिरवी हैं इस नगरी में  - हमीदा शाहीन

औरत को चाहिए कि अदालत का रुख़ करे जब आदमी को सिर्फ़ ख़ुदा का ख़याल हो - दिलावर फ़िगार अभी रौशन हुआ जाता है रास्ता  वो देखो एक औरत आ रही है - शकील जमाली 

औरतें काम पर निकली थीं बदन घर रख कर जिस्म ख़ाली जो नज़र आए तो मर्द आ बैठे - फ़रहत एहसास औरत अपना आप बचाए तब भी मुजरिम होती है औरत अपना आप गँवाए तब भी मुजरिम होती है - नीलमा सरवर

औरत हूँ मगर सूरत-ए-कोहसार खड़ी हूँ एक सच के तहफ़्फ़ुज़ के लिए सबसे लड़ी हूँ - फ़रहत ज़ाहिद औरत को जो समझता था मर्दों का खिलौना उस शख़्स को दामाद भी वैसा ही मिला है - तनवीर सिप्रा

किस्सा-ए-आलम में एक और ही वहदत पैदा कर ली है मैंने अपने अंदर अपनी औरत पैदा कर ली है - फ़रहत एहसास देखूं तेरे हाथों को तो लगता है तेरे हाथ मंदिर में फ़कत दीप जलाने के लिए हैं  - जाँ निसार अख़्तर

बहुत कम बोलना अब कर दिया है कई मौक़ों पे गुस्सा भी पिया है - शम्स तबरेज़ी हिम्मत है तो बुलंद कर आवाज़ का अलम चुप बैठने से हल नहीं होने का मसला - ज़िया जालंधरी

आगही कर्ब वफ़ा सब्र तमन्ना एहसास मेरे ही सीने में उतरे हैं ये ख़ंजर सारे  - बशीर फ़ारुक़ी मुझ में थोड़ी सी जगह भी नहीं नफ़रत के लिए मैं तो हर वक़्त मोहब्बत से भरा रहता हूँ - मिर्ज़ा अतहर ज़िया

आप दौलत के तराज़ू में दिलों को तौलें हम मोहब्बत से मोहब्बत का सिला देते हैं - साहिर लुधियानवी दुआ को हाथ उठाते हुए लरज़ता हूँ कभी दुआ नहीं माँगी थी माँ के होते हुए - इफ़्तिख़ार आरिफ़

एक मुद्दत से मेरी माँ नहीं सोई 'ताबिश' मैंने इक बार कहा था मुझे डर लगता है - अब्बास ताबिश भारी बोझ पहाड़ सा कुछ हल्का हो जाए जब मेरी चिंता बढ़े माँ सपने में आए - अख़्तर नज़्मी

Most Popular

Disclaimer

अपनी वेबसाइट पर हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर अनुभव प्रदान कर सकें, वेबसाइट के ट्रैफिक का विश्लेषण कर सकें, कॉन्टेंट व्यक्तिगत तरीके से पेश कर सकें और हमारे पार्टनर्स, जैसे की Google, और सोशल मीडिया साइट्स, जैसे की Facebook, के साथ लक्षित विज्ञापन पेश करने के लिए उपयोग कर सकें। साथ ही, अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।