कोरोना वायरस से संक्रमण के चलते देश लाॅकडाऊन है ऐसे में सभी लोग अपने घर पर हैं। इन परिस्थितियों में अमर काव्य कैफ़े लगातार फ़ेसबुक और यूट्यूब लाइव के ज़रिये आपको साहित्य और कला जगत की हस्तियों से रूबरू करवा रहा है। इसी क्रम में पिछले दिनों ऑस्ट्रलिया से आपने विवेक आसरी को सुना।
विवेक आसरी कर्म से पत्रकार, मन से घुमक्कड़ी और वचन से लेखक और कवि हैं। वह 15 वर्ष से पत्रकारिता कर रहे हैं। भारत, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया के मीडिया संस्थानों में ऑनलाइन, रेडियो और टीवी पत्रकारिता कर चुके हैं, फिलहाल ऑस्ट्रेलिया के एसबीएस रेडियो की हिंदी सेवा के लिए बतौर प्रोड्यूसर काम कर रहे हैं। जर्मनी की अंतरराष्ट्रीय सेवा डॉयचेवेले के साथ भी काम किया है, नाट्यकर्म में कई वर्षों से सक्रिय हैं। उनके पहले नाटक 'होली काउ का गोबर उर्फ कोर्ट मार्शल नहीं' को 2009 का मोहन राकेश सम्मान मिला था। इस बीच कई नाटकों का निर्देशन भी किया। प्रस्तुत है उनकी 2 कविताएं-
उदासियां भीड़ में चलती हैं
धीमे धीमे
एक दूसरे से सोशल डिस्टेंस बनाए हुए
कंधों पर अपने-अपने होने की वजहें उठाए हुए
छोटी सी उदासी पकड़ लेती हौसले का हाथ
जिसके कंधे पर लदा है समूचा वर्तमान
और पीठ पर टंगा है
सोया हुआ एक छोटा सा खुशी का टुकड़ा
पीछे पीछे घिसट रही है उम्मीद
जिसे मुड़ मुड़ कर देखता है हौसला
विज्ञापन
हौसला थकता है तो हल्का सा झुक कर
खुशी के टुकड़े को ऊपर की ओर धकेलता है
ध्यान रखते हुए कि वर्तमान गिरकर बिखर न जाए
खुशियां कभी मजमे में नहीं चलतीं
वे सुरक्षाकवच में जीती हैं
एकांतवास जैसे खेल खेलती हुईं
जिसके नियमों में शामिल हैं
खोल और मखौल
स्वयं वायरस हो चुके हैं
हम डरे हुए लोग
अपनी बना लेना चाहते हैं
सारी निर्जीव चीजें.
कब्जा लेना चाहते हैं
सबकुछ जड़,
और जो कुछ भी जिंदा है
उस पर चस्पा कर देना चाहते हैं
खतरे का निशान
घर के बाहर युद्ध से हालात हैं
क्योंकि हम सबने चढ़ा रखे हैं
आखों पर आइने
सिर्फ खुद को देखते हैं
इसलिए लगातार टकराते हैं
एक दूसरे से
और हर टक्कर के बाद खीजते हैं
कि सामने वाला देखकर क्यों नहीं चलता
अक्स गुजर रहे हैं
अक्स पसर रहे हैं
अक्स ही कर रहे हैं
जो कुछ भी हो रहा है
और घरों में छिपे बैठे हैं
स्वयं वायरस हो चुके
हम डरे हुए लोग
जिंदा कहां हैं
हम मरे हुए लोग