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जो ज़ेहन-ओ-दिल के ज़हरीले बहुत हैं...

रत्नेश मिश्र

Kavya Charcha
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                                                  जो ज़ेहन-ओ-दिल के ज़हरीले बहुत हैं
वही बातों के भी मीठे बहुत हैं
- अख़तर शाहजहाँपुरी

मैं तो ज़हरीले साँपों को अब भी दूध पिलाता हूँ
ये मेरी फ़ितरत है 'अख़्तर' या मेरी नादानी है
- अख़्तर अब्दुर्रशीद

नफ़रतों की नई दीवार उठाते हुए लोग
क्या अजब लोग हैं ज़िंदान बनाते हुए लोग
एहतिमाम सादिक़
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तेरे ख़त आज लतीफ़ों की तरह लगते हैं
ख़ूब हँसता हूँ जहाँ लफ़्ज-ए-वफ़ा आता है
- ज़ुबैर अली ताबिश

अपने ज़हरीले दाँत गाड़ ने के लिए
जब वो फनफना कर बाहर आते हैं
- परवेज़ शहरयार

औरों पर इल्ज़ाम-तराशी फ़ितरत है हम लोगों की
सच पूछो तो पाल रखे हैं हम ने ख़ुद ज़हरीले नाग
- शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी

आँखों को देखने का सलीक़ा जब आ गया
कितने नक़ाब चेहरा-ए-असरार से उठे
-अकबर हैदराबादी 

गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया 
होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया 
- निदा फ़ाज़ली

है देखने वालों को संभलने का इशारा
 थोड़ी सी नक़ाब आज वो सरकाए हुए हैं
-अर्श मलसियानी

जो ज़ेहन-ओ-दिल के ज़हरीले बहुत हैं 
वही बातों के भी मीठे बहुत हैं
- अख़तर शाहजहाँपुरी

उन से बच कर चलना बाबा ये क़ातिल ज़हरीले हैं
सूरत के मोहन हैं भीतर से सब नीले पीले हैं
- अनवर साबरी
5 वर्ष पहले
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