रघुवीर सहाय ग़ुलाम भारत में पैदा हुए उन विरले कवियों में से एक हैं जिन्होंने जंज़ीरों में जकड़न से लेकर स्वतंत्रता तक की यात्रा के जिन पहलूओं को देखा उसी सच्चाई के साथ उस लिख भी दिया। रघुवीर ने जब होश संभाला होगा तब देश स्वतंत्र हुआ होगा। उसी देश, काल और वातावरण का वास्तविक असर उनकी काव्य- रचना पर भी पड़ा है।
उनकी कविताओं में उनके ज़हन का पुट नज़र आता है। सीधा प्रहार करते हुए वह अपनी दिली बातें रख देते हैं और संकोच नहीं करते। इससे रघुवीर का काव्य और भी विशिष्ट हो जाता है। उनकी एक कविता है ‘नेता क्षमा करें’
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लोगों मेरे देश के लोगों और उनके नेताओं
मैं सिर्फ़ एक कवि हूं
मैं तुम्हें रोटी नहीं दे सकता न उसके साथ खाने के लिए ग़म
न मैं मिटा सकता हूँ ईश्वर के विषय में तुम्हारा सम्भ्रम
लोगों में श्रेष्ठ लोगो मुझे माफ़ करो,
मैं तुम्हारे साथ आ नहीं सकता।
यानी कि आप ही सोचें कि जो कवि नहीं हैं
कि लोग सब एक तरफ़ और मैं एक तरफ़
और मैं कहूँ कि तुम सब मेरे हो
पूछिए, कौन हूँ मैं ?
मैंने कोशिश की थी कि कुछ कहूँ उनसे
लेकिन जब कहा तुमको प्यार करता हूँ
मेरे शब्द एक लहरिया दोगाना बन
उकडू बैठे लोगों पर भिनभिनाने लगे
फिर कुछ लोग उठे बोले कि आइए तोड़ें पुरानी-फ़िलहाल-मूर्तियाँ
साथ न दो हाथ ही दो सिर्फ उठा
झोले में बन्द कर एक नयी मूर्ति मुझे दे गये
यानी कि आप ही देखें कि जो कवि नहीं हैं
अपनी एक मूर्ति बनाता हूँ और ढहाता हूँ
और आप कहते हैं कि कविता की है
क्या मुझे दूसरों को तोड़ने की फुरसत है ?
9 दिसंबर 1929 को लखनऊ में पैदा हुए रघुवीर सहाय एक प्रभावशाली कवि तो थे ही साथ ही निबंधकार व कथाकार भी थे। रघुवीर की कविताओं पर किसी विशेष परंपरा या युग का प्रभाव नहीं दिखाई पड़ता। उन्होंने जो रचनाएं कीं, उससे हिंदी जगत को नए आयाम मिले। मसलन
मत पूछना हर बार मिलने पर कि 'कैसे हैं'
सुनो, क्या सुन नहीं पड़ता तुम्हें संवाद मेरे क्षेम का
लो, मैं समझता था कि तुम भी कष्ट में होंगी
तुम्हें भी ज्ञात होगा दर्द अपने इस अधूरे प्रेम का अतुकांत
चूंकि रघुवीर सहाय एक पत्रकार थे इसलिए उनकी साहित्यिक भाषा भी ख़बर की भाषा ही अनुभव होती है। आस-पास की तमाम घटनाओं को रचनात्मक रूप देकर उनसे समाज की चेतना को जगाना, यही असली कविता को मकसद है। इसके लिए रघुवीर सहाय एक आदर्श उदाहरण हैं। वह लिखते हैं कि
फिर जाड़ा आया फिर गर्मी आई
फिर आदमियों के पाले से लू से मरने की ख़बर आई
न जाड़ा ज़्यादा था न लू ज़्यादा
तब कैसे मरे आदमी
वे खड़े रहते हैं तब नहीं दिखते
मर जाते हैं तब लोग जाड़े और लू की मौत बताते हैं
ऐसी ख़बरें अख़बारों में चर्चा का विषय रहती हैं कि कितनी मौत हुईं और कैसे हुईं, यह तो रघुवीर सहाय बताते हैं। लेकिन साथ ही वह इस ओर ध्यान ले जाना चाहते हैं कि जब इन ज़िंदगियों को बचाया जा सकता था तब उन पर ध्यान क्यूं नहीं दिया गया। या सिर्फ़ उन लोगों के ख़बर हो जाने का इंतज़ार था।
साहित्य और पत्रकारिता यूं भी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। साहित्य समाज की वेदनाओं को व्यक्त करने का मार्मिक माध्यम है। इस विषय पर स्वयं सहाय कहते हैं कि पत्रकार और साहित्यकार दोनों नए मानव संबंध की तलाश करते हैं। दोनों ही दिखाना चाहते हैं कि दो मनुष्यों के बीच नया संबंध क्या बना। दोनों के उद्देश्य में पूर्ण समानता है। पत्रकार के लिए यथार्थ वही है जो संभव हो चुका है। साहित्यकार के लिए वह है जो संभव हो सकता है।
साभार- प्रतिनिधि कविता
राजकमल प्रकाशन