क़त्ल, क़ातिल जैसे शब्द शायरी में हिंसा और प्रेम दोनों अर्थों में प्रयोग में लाये गये हैं। अलग शेर अपने पाठ में ही अर्थों की तरफ इशारा कर देते हैं। पेश है क़त्ल शायरी-
की मिरे क़त्ल के बाद उस ने जफ़ा से तौबा
हाए उस ज़ूद-पशीमाँ का पशीमाँ होना
~मिर्ज़ा ग़ालिब
क़त्ल तो नहीं बदला क़त्ल की अदा बदली
तीर की जगह क़ातिल साज़ उठाए बैठा है
~कैफ़ भोपाली
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दामन पे कोई छींट न ख़ंजर पे कोई दाग़
तुम क़त्ल करो हो कि करामात करो हो
~कलीम आजिज़
वो मेरे क़त्ल का मुल्ज़िम है लोग कहते हैं
वो छुट सके तो मुझे भी गवाह लिख लीजे
~बेकल उत्साही
क़ातिल ने किस सफ़ाई से धोई है आस्तीं
उस को ख़बर नहीं कि लहू बोलता भी है
~इक़बाल अज़ीम
आता है दाग़-ए-हसरत-ए-दिल का शुमार याद
मुझ से मिरे गुनह का हिसाब ऐ ख़ुदा न माँग
~मिर्ज़ा ग़ालिब
यूँ न क़ातिल को जब यक़ीं आया
हम ने दिल खोल कर दिखाई चोट
~फ़ानी बदायुनी
शहर के आईन में ये मद भी लिक्खी जाएगी
ज़िंदा रहना है तो क़ातिल की सिफ़ारिश चाहिए
~ हकीम मंज़ूर
हमारे क़त्ल से क़ातिल को तजरबा ये हुआ
लहू लहू भी है मेहंदी भी है शराब भी है
~कलीम आजिज़
हमें तो अहल-ए-सियासत ने ये बताया है
किसी का तीर किसी की कमान में रखना
~ महबूब ज़फ़र