पूजा पुनेठा कवयित्री और कार्यक्रम प्रस्तोता हैं। तमाम मंचों पर वह अपनी कविताऔं का पाठ कर चुकी हैं। फिलहाल वह राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग से जुड़ कर बच्चों के अधिकारों के लिए काम कर रही हैं।
कुछ वादे बोलते नहीं
सिर्फ उतरते हैं आहिस्ता से
दुखते मन को सहलाने को
तुम्हारा कांधे पे हाथ रख देना भर ही
कह देता है दूर तक साथ चलने को
मगर आवाज़ नहीं करता
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चाँद का बैठ जाना सटकर
बगल की खाली जगह चुपचाप
अहसास की तुम साथ हो
मद्धम स्वर में बजता है
किताबें खींचकर बैठाती हुई
होले से कानों में
सुनाती है नया कुछ भी नहीं
ये सबके साथ होता है
ठंडी सी बहकी हवा फिज़ा में
घोलकर तेरी यादों के टुकड़े
चप्पे चप्पे में फैली उदासी को
महकाने लगती है
मेरे आँगन का पीपल
मुझे आग़ोश में भरकर
सूखे पत्तों के झुनझुने
बजाकर सुला देता है
और ये बारिश कभी
बिन बुलाई सहेली सी
भूली यादों को गुदगुदाते हुए
जिस्म भिगोने लगती है
बड़े ख़राब से बीते हुए दिन का
वो आख़िरी लम्हा
गालों को थपथपाते हुए कहता है
देखा सब बीत ही गया
तुम, चाँद, किताबें, हवा,
पेड़, बारिश और लम्हें
इश्क़ की खुराक
तेरा इश्क़ बेल जैसा
लिपटता रहता है और
जकड़ता रहता है मुझे
बरस जाने पर
गुलाबी फूल खिलते हैं
और सूखने लगती हैं
ज़्यादा जुदाई वाली धूप में
छोटी-छोटी टहनियाँ
जिस्म में सूराख़ कर
चूसने लगती है
क़तरा-क़तरा इश्क़
इश्क़ का रंग हरा तभी है शायद
पत्तियों पर ठहरी हुई
ओस की बूंदें
तेरी जमा ख़्वाहिशों जैसी
सुबह होते ही
मेरी सतहों पर फैल जाती हैं
ये पैदा फल शायद
निशानी होगी उस रात की
जब चाँद ने फेंककर मारा था
वो जादू का मंत्र...
कुम्लाये लम्हें
सूखी कलियाँ बनकर
छिटक के दफ़न हो जाते हैं
मेरे ही दायरे में
मगर ख़ुश्बू कभी नहीं जाती
जड़ें पसरने लगी हैं और भी गहराई में
रोज़ सींचती जो हूँ इन्हें
रूमी की दिल फ़रेब बातों से
मीरा के जुनून-ए-इश्क़ से
आबिदा के सूफ़ी कलामों से
जगजीत के दर्द तरानों से
इश्क़ की बेल को इश्क़ की ख़ुराक चाहिए !!
पहाड़ों, नदियों, पेड़ों, सड़कों
और किताबों से बातें करना
अपने सवालों की गठरी बनाकर
दबा देना उनके मन के भीतर
उनके मन के भीतर ऐसी अनगिनत गठरियां हैं
पहाड़ क्यों गिरा देते हैं अपनी देह के हिस्से
नदियों में बाढ़ यूँ ही नहीं आती
पेड़ अचानक इतना शोर क्यों करते हैं
सड़कें क्यों चूसने लगती हैं लहू
और शेल्फ में रखी कुछ किताबें हो जाती हैं गुमशुदा
इन घटनाओं के होने पर
सब अपने-अपने तर्क
दे रहे होते हैं
पर कोई नहीं जान पाता कभी भी
क्यों सब गठरियां एक दिन खुल जाती हैं…