देश के कई शहर भीषण जलसंकट से झेल रहे हैं। चेन्नई में पानी के लिए लंबी लंबी कतारें लग रही हैं। पेय जल के स्रोत सूख गए हैं, गली गली में पानी के टैंकर दौड़ रहे हैं। कविताएं जो नीचे प्रस्तुत की जा रही हैं, पानी के संकट पर ही आधारित हैं।
पानी माँगे ताल
सूखी नदिया, झील पियासी
पानी माँगे ताल
मौसम के सिर चढ़कर नाचे
फिर अगिया बेताल
उल्टी सीधी शर्त लगाए
नाचे दे-दे ताली
सुलग रहा है बिरवा-बिरवा
झुलस रही हर डाली
ढूँढ़े मिले न उत्तर ऐसे
पूछे कठिन सवाल
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मौन बस्तियों में पसरे हैं
आतंकी सन्नाटे
आते-जाते हवा लगाती
है लपटों के चाँटे
सहमे गली और चौराहे
सुबक रहे चौपाल
झुलसे पंख लिए गौरेया
दुबकी घर के कोने
टिके पेड़ से हाँफ रहे हैं
ये बेबस मृगछौने
मरी बिचारी सोन मछरिया
ऐसा पड़ा अकाल
चिंताओं की गठरी लादे
धनिया खड़ी दुआरे
सोच रही है कैसे
आँगन के दुख-दर्द बुहारे
किसे दिखाए घाव हृदय के
किसे सुनाए हाल
मौसम के सिर चढ़कर नाचे
फिर अगिया बेताल
- मधु शुक्ला
पानी
हिल रहा था पानी का आँचल
कीचड़ से सनी उसकी देह जैसे सभ्यता का शव हो
कभी गाये थे कलश ने उसकी गरिमा के गीत
अँजुरी में मंत्र की तरह भरती थी उसकी पवित्रता
सभ्यताओं ने सुनी
घने जंगलों और उदास पहाड़ों से होकर
समतल मैदानों में बहता उसका गीत
धरती देखती थी प्यासी आँखों से
चमकते, गरजते, बरसते पानी की धज को
भीगी रात में वनस्पतियों के तन पर
ओस की टप टप का संगीत भरता था जीवन
नदी किनारें जन्मी सभ्यताएँ
एक दिन बिन पानी इसी तरह
मछली की तरह रेत पर छटपटाएँगी
पत्थर की शय्या पर
- अरुण देव