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'पैग़ाम' पर कहे शायरों के अल्फ़ाज़

दीपाली अग्रवाल

Kavya Charcha
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एक तख़्ती अम्न के पैग़ाम की
टांग दीजे ऊंचे मीनारों के बीच
- अज़ीज़ नबील


पैग़ाम ज़िंदगी ने दिया मौत का मुझे
मरने के इंतिज़ार में जीना पड़ा मुझे
- सफ़ी लखनवी

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रात दिन नामा-ओ-पैग़ाम कहां तक दोगे
साफ़ कह दीजिए मिलना हमें मंज़ूर नहीं
- हसरत मोहानी


कहा क्या जाने क्या पैग़ाम-बर से
बहुत ख़ुश आज आता है उधर से
- लाला माधव राम जौहर

हर तरफ़ छा गए पैग़ाम-ए-मोहब्बत बन कर
मुझ से अच्छी रही क़िस्मत मेरे अफ़्सानों की
- जिगर मुरादाबादी


इश्क़ उदासी के पैग़ाम तो लाता रहता है दिन रात
लेकिन हम को ख़ुश रहने की आदत बहुत ज़ियादा है
- ज़फ़र इक़बाल

वो भी दिन था कि तिरे आने का पैग़ाम आया
तब मिरे घर में क़दम बाद-ए-सबा ने रक्खा
- अकबर हमीदी


फाड़ कर ख़त उस ने क़ासिद से कहा
कोई पैग़ाम-ए-ज़बानी और है
- सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

कुछ नहीं समझा हूं इतना मुख़्तसर पैग़ाम था
क्या हवा थी जिस हवा के हाथ पर पैग़ाम था
- ज़फ़र इक़बाल


पैग़ाम ज़िंदगी ने दिया मौत का मुझे
मरने के इंतिज़ार में जीना पड़ा मुझे
- सफ़ी लखनवी

ले कर कोई पैग़ाम कबूतर नहीं आते
अब ग़म भी तिरा रूप बदल कर नहीं आते
- इशरत किरतपुरी

5 वर्ष पहले
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