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वे सभी ग़ज़लें और ग़ज़लकार जिन्हें मिली मोहम्मद रफ़ी की आवाज़

दीपाली अग्रवाल

Kavya Charcha
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मोहम्मद रफ़ी और उनकी आवाज़ किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं, उन्होंने हिन्दी सिनेमा के कई गीतों को अपनी आवाज़ की रेशम के बांधा है इससे कई गीतकारों के बोलों को सुरों से संवरने का मौका मिला साथ ही रफ़ी साहब ने कई ग़ज़लकारों के कलामों को भी गाया है।

पेश हैं वह शायर और उनके कलाम जिन्हें रफ़ी साहब ने अपनी आवाज़ दी है। 

 
मिर्ज़ा ग़ालिब
 
बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना

गिर्या चाहे है ख़राबी मेरे काशाने की
दर ओ दीवार से टपके है बयाबाँ होना

वा-ए-दीवानगी-ए-शौक़ कि हर दम मुझ को
आप जाना उधर और आप ही हैराँ होना

जल्वा अज़-बस-कि तक़ाज़ा-ए-निगह करता है
जौहर-ए-आइना भी चाहे है मिज़्गाँ होना



इशरत-ए-क़त्ल-गह-ए-अहल-ए-तमन्ना मत पूछ
ईद-ए-नज़्ज़ारा है शमशीर का उर्यां होना

ले गए ख़ाक में हम दाग़-ए-तमन्ना-ए-नशात
तू हो और आप ब-सद-रंग-ए-गुलिस्ताँ होना

इशरत-ए-पारा-ए-दिल ज़ख़्म-ए-तमन्ना खाना
लज़्ज़त-ए-रीश-ए-जिगर ग़र्क़-ए-नमक-दाँ होना

कि मेरे क़त्ल के बा'द उस ने जफ़ा से तौबा
हाए उस ज़ूद-पशीमाँ का पशेमाँ होना

हैफ़ उस चार गिरह कपड़े की क़िस्मत 'ग़ालिब'
जिस की क़िस्मत में हो आशिक़ का गरेबाँ होना
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दाग़ देहलवी

ग़ज़ब किया तेरे वादे पे एतिबार किया
तमाम रात क़यामत का इंतिज़ार किया

हँसा हँसा के शब-ए-वस्ल अश्क-बार किया
तसल्लियाँ मुझे दे दे के बेक़रार किया



हम ऐसे महव-ए-नज़ारा न थे जो होश आता
मगर तुम्हारे तग़ाफ़ुल ने होशियार किया

फ़साना-ए-शब-ए-ग़म उनको इक कहानी थी
कुछ एतबार किया कुछ न एतबार किया

सुना है तेग़ को क़ातिल ने आब-दार किया
अगर ये सच है तो बे-शुबह हम पे वार किया

जाँ निसार अख़्तर

पूछ न मुझसे दिल के फ़साने 
इश्क़ की बातें इश्क़ ही जाने 

वो दिन जब हम उन से मिले थे 
दिल के नाज़ुक फूल खिले 
मस्ती आँखें चूम रही थी 
सारी दुनिया झूम रही 
दो दिल थे वो भी दीवाने 



वो दिन जब हम दूर हुये थे 
दिल के शीशे चूर हुये थे 
आई ख़िज़ाँ रंगीन चमन में 
आग लगी जब दिल के बन में 
आया न कोई आग बुझाने

जिगर मुरादाबादी

साक़ी की हर निगाह पे बल खा के पी गया
लहरों से खेलता हुआ लहरा के पी गया

ज़ाहिद! ये तेरी शोख़ी-ए-रिन्दाना देखना
रहमत को बातों बातों में बहला के पी गया

ऐ रहमत-ए-तमाम मेरी हर ख़ता मुआफ़
मैं इंतिहा-ए-शौक़ में घबरा के पी गया



सर-मस्ती-ए-अज़ल मुझे जब याद आ गई
दुनिया-ए-एतिबार को ठुकरा के पी गया

बे-कैफ़ियों के कैफ़ से घबरा के पी गया
तौबा को तोड़-ताड़ के थर्रा के पी गया

कृष्णा अदीब

तल्ख़ी-ए-मय में ज़रा तल्ख़ी-ए-दिल भी घोलें
और कुछ देर यहाँ बैठ के पी लें रो लें

हर तरफ़ एक पुर-असरार सी ख़ामोशी है
अपने साए से कोई बात करें कुछ बोलें



कोई तो शख़्स हो जी-जान से चाहें जिस को
कोई तो जान-ए-तसव्वुर हो कि जिस के हो लें

आह ये दिल की कसक हाए ये आँखों की जलन
नींद आ जाए अगर आज तो हम भी सो लें

सुदर्शन फ़ाकिर

एक ही बात ज़माने की किताबों में नहीं
जो ग़म-ए-दोस्त में नशा है शराबों में नहीं 

हुस्न की भीख ना मांगेंगे ना जलवों की कभी 
हम फ़कीरों से मिलो ख़ुल के हिजाबों में नहीं 



हर जगह फिरते हैं आवारा ख़यालों की तरह
ये अलग बात है हम आपके ख़्वाबों में नहीं 

ना डुबो सागर-ओ-मीना में ये ग़म ऐ फ़ाकिर
ये मकाम इनका दिलों में है शराबों में नहीं  

मीर तक़ी मीर

दिल की बात कही नहीं जाती, चुप के रहना ठाना है
हाल अगर है ऐसा ही तो जी से जाना जाना है

सुर्ख़ कभू है आँसू होती ज़र्द् कभू है मूँह मेरा
क्या क्या रंग मोहब्बत के हैं, ये भी एक ज़माना है



फ़ुर्सत है यां कम रहने की, बात नहीं कुछ कहने की
आँखें खोल के कान जो खोले बज़्म-ए-जहां अफ़साना है

तेग़ तले ही उस के क्यूँ ना गर्दन डाल के जा बैठें
सर तो आख़िरकार हमें भी हाथ की ओर झुकाना है

7 वर्ष पहले
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