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बनारस दुनिया के दिल का नुक़्ता है: मिर्ज़ा ग़ालिब 

रत्नेश मिश्र

Kavya Charcha
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                                                  मिर्ज़ा ग़ालिब की बनारस-यात्रा मशहूर है। उन्होंने बनारस में जो कुछ भी देखा था उसे अपने एक मसनवी 'चिराग-ए-दैर' में लिखा, यह मसनवी उन्होंने फ़ारसी में लिखी थी। बनारस पहुंचकर जब ग़ालिब ने वहां 3 हफ़्ते गुज़ारे और शहर से परिचित हो गए तब उन्होंने अपने दोस्त मौलवी मोहम्मद अली खां को एक लंबा पत्र लिखा। इस पत्र में बनारस के संबंध में उनकी मन:स्थितियों का बेहद मार्मिक चित्रण मिलता है। वे लिखते हैं-  

''जब मैं बनारस में दाखिल हुआ, उस दिन पूरब की तरफ़ से जान बख़्शने वाली, जन्नत की- सी हवा चली, जिसने मेरे बदन को तवानाई अता की और दिल में एक रूह फूंक दी। उस हवा के करिश्माई असर ने मेरे जिस्म को फ़तह के झण्डे की तरह बुलंद कर दिया। ठण्डी हवा की लहरों ने मेरे बदन की कमजोरी दूर कर दी।''
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मूल फ़ारसी से हिंदी में सादिक़ द्वारा अनूदित, राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित किताब 'चिराग-ए-दैर' में बनारस पर केंद्रित कविताएं संकलित हैं। प्रस्तुत है कुछ चुनिंदा शेर अनुवाद सहित- 

ब-ख़ातिर दारम ईनक गुल ज़मीने 
बहार आई  सवाद-ए-दिल नशीने


अनुवाद- 

आ गया है 
मेरा दिल 
फूलों की ऐसी ज़मीं पर 
जिसकी आबादी 
है सुंदर 
जो सुगंध और रंग का 
ऐसा चमन है 

हर तरफ़ जिसमें 
बहारों का चलन है 

बनारस रा कसे गुफ़ता कि चीनस्त
हनोज़ अज़ गंग चीनश बर जबीनश्त
 

बनारस रा कसे गुफ़ता कि चीनस्त
हनोज़ अज़ गंग चीनश बर जबीनश्त

अनुवाद- 


किसी नादान ने
यह कह दिया था 
कि बनारस 
चीन के मानिंद है 

यह 
बात सुनकर 
मौज-ए-गंगा
बन गयी,
माथे का बल 

सो आज तक है । 

ऐसा नहीं कि बनारस पर फ़ारसी भाषा में सबसे पहले ग़ालिब ने ही लिखा हो। हक़ीक़त  यह है कि फ़ारसी भाषा में बनारस के विषय मे लिखने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। ग़ालिब ने मसनवी 'चिराग-ए-दैर' लिखकर उसी परंपरा का विस्तार किया। बनारस में कुछ दिन गुज़ारने और शहर के विभिन्न इलाक़ों की शैर करने के बाद उन्होंने जो अनुभव किया उसके बारे में लिखते हैं- 

''बनारस शहर के क्या कहने ! अगर मैं इसे दुनिया के दिल का नुक़्ता (बिंदु) कहूं तो दुरुस्त है। इसकी आबादी और इसके अतराफ़ के क्या कहने ! अगर हरियाली और फ़ूलों के ज़ोर की वजह से मैं इसे ज़मीन पर जन्नत कहूं तो बजा है। इसकी हवा मुर्दों के बदन में रूह फूंक देती है। इसकी ख़ाक के ज़र्रे (कण) मुसाफ़िरों के तलवों से कांटे खींच निकालते हैं। अगर दरिया-ए-गंगा इसके क़दमों पर अपनी पेशानी न मलता तो वह हमारी नज़रों में मोहतरम (प्रतिष्ठित) न होता, और अगर सूरज इसके दरो-दीवार के ऊपर से न गुज़रता तो वह इतना रौशन और ताबनाक न होता।'' 

बनारस रा मगर दीदस्त दर ख़्वाब 
कि मी गरदद ज़े-नहरश दर दहन आब 

अनुवाद- 


बनारस शहर लासानी 
नहीं इसका कोई शानी 
मुझ तो ऐसा लगता है 
कि देहली ने 
बनारस को 
कभी सपने में देखा है 

तभी तो 
मुंह में भर आया 
नहर के रूप में पानी 

ज़हे आसूदगी बख़्श-ए-रवांहा 
कि दाग़-ए-चश्म मी शूयद ज़ जांहा 

अनुवाद- 


धन्य है 
धरती बनारस की 
जो हर इक 
आत्मा को 
शांति प्रदान करती है 

जो सारी आत्माओं से 
बुरी नज़रों के 
हर प्रभाव को 
धो डालती है 
हर बला को 
टालती है 

सवादश पा-ए-तख़्त-ए-बुतपरस्तां
सरापायश ज़ियारत गाह-ए-मस्तां 

अनुवाद- 


यह बस्ती 
एक मर्कज़ ख़ास है 
उन आस्थावानों का 
जिनको मूर्तिपूजक 
कहा जाता है 
पूरे विश्व में 

यही आरंभ से 
ले अंत तक 
मस्तों का 
तीर्थस्थल है 

इबादत ख़ाना-ए-नाक़ूसियानस्त 
हमाना काबा-ए-हिंदोस्तानस्त 

अनुवाद- 


मैं आंखों देखे 
और कानों सुने 
अपने अनुभव 
ज़ेहन में रखकर 
यह कहता हूं 

बनारस 
आस्थावानों का 
इक पावन 
इबादतख़ाना है 

बेशक यह
हिंदुस्तान का 
काबा है 

बिरादर-बा-बिरादर दर-सतेज़स्त 
विफ़ाक़ अज़ शश-जिहत रू दर गुरेजस्त 

अनुवाद-


भांजकर तलवारें
भाई 
भाइयों से 
लड़ने-मरने पर 
तुले हैं 

देखकर
यह दृश्य 

प्रेम और शांति 
अब हर दिशा से 
मुंह छुपाये 
भागते हैं 

कि हक़्क़ा नीस्त साने रा गवारा 
कि अज़ हम रीज़द ई रंगीं बिनारा 

अनुवाद- 


सच यह है 
परमेश्वर को 
ख़ुद नहीं मंजूर 
कि सृष्टि का 
अप्रतिम 
यह सुंदरतम नगर 
(काशी)
क़यामत की वजह से 
नष्ट और नाबूद हो जाए 

बुलंद-उप तादा तमकीन-ए-बनारस 
बुवद बर और-ए-उ अंदेशा ना रस

अनुवाद- 


बुलंद इतनी 
बनारस शहर की है 
शान-ओ-शौकत 
और अज़मत 
कि 
मानव-कल्पना भी 
चाहे तो 
उसके शिखर को 
छू नहीं सकती।

जुनूंनत गर बि-नफअस-ए-ख़ुद तमामस्त 
ज़ि-काशी ताब: काशां नीम गामस्त

अनुवाद- 


अगर दीवानगी 
अपनी जगह 
भरपूर है 
तो फिर समझ लो 
काशी से 
काशान 
बस आधे क़दम 
ही दूर है 

मसनवी के अंतिम शेरों में ग़ालिब हमें उस बुलंदोबाला मुक़ाम पर खड़े नज़र आते हैं  जहां समस्त धर्म और आस्थाएं एक-दूजे में घुलमिलकर एक हो जाती है। चाहे वह हिंदू विचारधारा हो या इस्लाम, बौद्ध हों या कोई और, सभी चिराग़-ए-दैर की रौशनी बन जाते हैं। 

मदेह अज़ कफ़ तरीक़-ए-मारिफ़त रा 
सरत गर्दम ब-गर्द ईं शिश- जेहत रा 

अनुवाद- 


जो
बनारस की 
फ़जाओं में मिला 
अध्यात्म का रस्ता 
बहुत अच्छा है 
और सच्चा है 
यह 
हरगिज़ न छोड़ो 

षट-दिशाओं में 
करो विचरण 
तुम इससे 
मुंह न मोड़ो 

बि-काशी लख़्ते अज़ काशाना याद आर 
दरीं जन्नत अज़ां वीराना याद आर 


बैठकर काशी में
अपना भूला काशाना 
ज़रा तुम 
याद कर लो 
जिसको छोड़े 
एक मुद्दत हो 
रही है 

आज इस 
जन्नत में बैठे 
तुम ज़रा 
उस छोड़े वीराने के 
बारे में सोचो 
जिसकी क़िस्मत 
सो रही है।
6 वर्ष पहले
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