न इंतिज़ार करो इनका ऐ अज़ा-दारो
शहीद जाते हैं जन्नत को घर नहीं आते
-साबिर ज़फ़र
शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले
वतन पर मरनेवालों का यही बाक़ी निशाँ होगा
- जगदंबा प्रसाद मिश्र ‘हितैषी’
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मर के पाया शहीद का रुत्बा
मेरी इस ज़िंदगी की उम्र दराज़
-जोश मलीहाबादी
ऐ वतन जब भी सर-ए-दश्त कोई फूल खिला
देख कर तेरे शहीदों की निशानी रोया
- जाफ़र ताहिर
लहू वतन के शहीदों का रंग लाया है
उछल रहा है ज़माने में नाम-ए-आज़ादी
- फ़िराक़ गोरखपुरी
कभी तो शहीदों की क़ब्रों पे आओ
ये सब घर तुम्हारे बसाए हुए हैं
- तअशशुक़ लखनवी
दिल से निकलेगी न मर कर भी वतन की उल्फ़त
मेरी मिट्टी से भी ख़ुशबू-ए-वफ़ा आएगी
- लाल चन्द फ़लक
वतन के जां-निसार हैं वतन के काम आएंगे
हम इस ज़मीं को एक रोज़ आसमां बनाएंगे
- जाफ़र मलीहाबादी