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हो जाये अच्छी भी फसल, पर लाभ कृषकों को कहां- मैथिलीशरण गुप्त

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
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                                                  आधुनिक हिंदी कविता के महत्पूर्ण हस्ताक्षर मैथिली शरण गुप्त का 3 अगस्त को जन्मदिन है। उनकी रचनाओं में देशभक्ति, बंधुत्व, गांधीवाद, मानवता किसानों-गरीबों के प्रति करुणा और सहानुभूति व्यक्त कि गई है । आइये पढ़ते हैं किसानों पर उनकी कविता-

हेमन्त में बहुदा घनों से पूर्ण रहता व्योम है
पावस निशाओं में तथा हंसता शरद का सोम है

हो जाये अच्छी भी फसल, पर लाभ कृषकों को कहां
खाते, खवाई, बीज ऋण से हैं रंगे रक्खे जहां
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आता महाजन के यहां वह अन्न सारा

आता महाजन के यहां वह अन्न सारा अंत में
अधपेट खाकर फिर उन्हें है काँपना हेमंत में

बरसा रहा है रवि अनल, भूतल तवा सा जल रहा
है चल रहा सन सन पवन, तन से पसीना बह रहा

देखो कृषक शोषित...

देखो कृषक शोषित, सुखाकर हल तथापि चला रहे
किस लोभ से इस आंच में, वे निज शरीर जला रहे

घनघोर वर्षा हो रही, है गगन गर्जन कर रहा
घर से निकलने को गरज कर, वज्र वर्जन कर रहा

तो भी कृषक मैदान में करते निरंतर काम हैं
किस लोभ से वे आज भी, लेते नहीं विश्राम हैं

तो भी कृषक ईंधन जलाकर, खेत पर हैं जागते

बाहर निकलना मौत है, आधी अंधेरी रात है
है शीत कैसा पड़ रहा, औ’ थरथराता गात है

तो भी कृषक ईंधन जलाकर, खेत पर हैं जागते
यह लाभ कैसा है, न जिसका मोह अब भी त्यागते

मानो भुवन से भिन्न उनका, दूसरा ही लोक है

सम्प्रति कहां क्या हो रहा है, कुछ न उनको ज्ञान है
है वायु कैसी चल रही, इसका न कुछ भी ध्यान है

मानो भुवन से भिन्न उनका, दूसरा ही लोक है
शशि सूर्य हैं फिर भी कहीं, उनमें नहीं आलोक है
 
8 वर्ष पहले
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