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सुप्रसिद्ध कवि केदारनाथ अग्रवाल की चुनिंदा 3 कविताएं

दीपाली अग्रवाल

Kavya Charcha
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जीवन से

ऐसे आओ
जैसे गिरि के श्रृंग शीश पर
रंग रूप का क्रीट लगाये
बादल आये,
हंस माल माला लहराये
और शिला तन-
कांति-निकेतन तन बन जाये।
तब मेरा मन
तुम्हें प्राप्त कर
स्वयं तुम्हारी आकांक्षा का
बन जायेगा छवि सागर,
जिसके तट पर,
शंख-सीप-लहरों के मणिधर
आयेंगे खेलेंगे मनहर,
और हंसेगा दिव्य दिवाकर।

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आज नदी बिलकुल उदास थी

आज नदी बिलकुल उदास थी।
सोई थी अपने पानी में,
उसके दर्पण पर-
बादल का वस्त्र पडा था।
मैंने उसको नहीं जगाया,
दबे पांव घर वापस आया।

ओस की बूंद कहती है

ओस-बूंद कहती है; लिख दूं
नव-गुलाब पर मन की बात।
कवि कहता है : मैं भी लिख दूं
प्रिय शब्दों में मन की बात।
ओस-बूंद लिख सकी नहीं कुछ
नव-गुलाब हो गया मलीन।
पर कवि ने लिख दिया ओस से
नव-गुलाब पर काव्य नवीन।
5 वर्ष पहले
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