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जिगर मुरादाबादी के ख़जाने से 20 चुनिंदा शेर...

रत्नेश मिश्र

Kavya Charcha
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                                                  हुस्न और इश्क़ का जिक्र आते ही जिगर मुरादाबादी का नाम बेसाख्ता ज़बान पर आ जाता है। मोहब्बत में महरूमी और मायूसी का सामना करने वाले जिगर की शायरी में ये एहसास शिद्दत से बयां होतें हैं। पेश है जिगर की ग़ज़लों से 20 चुनिंदा शेर...

दिल को सुकून रूह को आराम आ गया 
मौत आ गई कि दोस्त का पैग़ाम आ गया 

सुब्ह तक हिज्र में क्या जानिए क्या होता है 
शाम ही से मिरे क़ाबू में नहीं दिल मेरा 
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निगाहों का मरकज़ बना जा रहा हूँ 
मोहब्बत के हाथों लुटा जा रहा हूँ 

नज़र मिला के मिरे पास आ के लूट लिया 
नज़र हटी थी कि फिर मुस्कुरा के लूट लिया 

ब-ज़ाहिर कुछ नहीं कहते मगर इरशाद होता है 
हम उस के हैं जो हम पर हर तरह बर्बाद होता है 

कुछ खटकता तो है पहलू में मिरे रह रह कर 
अब ख़ुदा जाने तिरी याद है या दिल मेरा 

इश्क़ की चोट दिखाने में कहीं आती है 
कुछ इशारे थे कि जो लफ़्ज़-ओ-बयाँ तक पहुँचे 

रग रग में इस तरह वो समा कर चले गए 
जैसे मुझी को मुझ से चुरा कर चले गए 

आँसू तो बहुत से हैं आँखों में 'जिगर' लेकिन 
बंध जाए सो मोती है रह जाए सो दाना है 

ले के ख़त उन का किया ज़ब्त बहुत कुछ लेकिन 
थरथराते हुए हाथों ने भरम खोल दिया 

जिस दिल को तुम ने लुत्फ़ से अपना बना लिया 
उस दिल में इक छुपा हुआ नश्तर ज़रूर था 

उसी को कहते हैं जन्नत उसी को दोज़ख़ भी 
वो ज़िंदगी जो हसीनों के दरमियाँ गुज़रे 

मैं तो हर हालत में ख़ुश हूँ लेकिन उस का क्या इलाज 
डबडबा आती हैं वो आँखें 'जिगर' मेरे लिए 

हम इश्क़ के मारों का इतना ही फ़साना है 
रोने को नहीं कोई हँसने को ज़माना है 

ये हुस्न-ओ-जमाल उन का ये इश्क़-ओ-शबाब अपना 
जीने की तमन्ना है मरने का ज़माना है 

सीने से दिल अज़ीज़ है दिल से हो तुम अज़ीज़ 
सब से मगर अज़ीज़ है तेरी नज़र मुझे 

ये हुस्न ये शोख़ी ये करिश्मा ये अदाएँ 
दुनिया नज़र आई मुझे तो क्या नज़र आया 

जा और कोई ज़ब्त की दुनिया तलाश कर 
ऐ इश्क़ हम तो अब तिरे क़ाबिल नहीं रहे 

वो लाख सामने हों मगर इस का क्या इलाज 
दिल मानता नहीं कि नज़र कामयाब है 

एहसास-ए-आशिक़ी ने बेगाना कर दिया है 
यूँ भी किसी ने अक्सर दीवाना कर दिया है
7 वर्ष पहले
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