आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मुकेश आलम की ग़ज़ल: आँख में तेरा 'अक्स तिरे ही एक ख़याल से टूट गया

                
                                                         
                            आँख में तेरा 'अक्स तिरे ही एक ख़याल से टूट गया
                                                                 
                            
झील का चाँद तो मछली की हल्की सी चाल से टूट गया

चाहने वालो प्यार में थोड़ी आज़ादी भी लाज़िम है
देखो मेरा फूल ज़ियादा देख-भाल से टूट गया

मुश्किल दौर में अपनों पर दा'वे-दारी भी क्या करते
पतझड़ आई तो हर पत्ता अपनी डाल से टूट गया

कच्चे सपनों से अच्छा है पक्की नींदें सो लेना
ऐसे ख़्वाब को क्या रोना जो पलक के बाल से टूट गया

दिल के आगे 'अक़्ल की सारी चालें फीकी होती हैं
देखो राजा अदना से पियादे की चाल से टूट गया

टूट गया यूँ आँख से आँसू हिज्र के धड़के से 'आलम'
जैसे घुँगरू तबले की पहली ही ताल से टूट गया

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।

लिंक पर क्लिक करें और जुड़ें अमर उजाला काव्य के व्हाट्सएप चैनल से 

https://whatsapp.com/channel/0029VaXoA27A89Mp96alfc2o  


39 minutes ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर