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जांनिसार अख़्तर के 20 मशहूर शेर...

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
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                                                  बीसवीं सदी के शायरों में जांनिसार अख़्तर की शायरी का मयार काफी बड़ा है। उनके बारे में मशहूर शायर निदा फ़ाजली लिखते  हैं-  "जांनिसार आख़िरी दम तक जवान रहे। बुढ़ापे में जवानी का यह जोश उर्दू इतिहास में एक चमत्कार है जो उनकी याद को शेरो-अदब की महफ़िल में हमेशा जवान रखेगा"। पेश है जांनिसार के मशहूर अल्फाज़-  

आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो 
साया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो 

आँखों में दिल खुले हों तो मौसम की क़ैद क्या 
फ़स्ल-ए-बहार ही में बहार आए ये नहीं 
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आँखों में जो भर लोगे तो...

आँखों में जो भर लोगे तो काँटों से चुभेंगे
ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं

ऐ दर्द-ए-इश्क़ तुझ से मुकरने लगा हूँ मैं 
मुझ को संभाल हद से गुज़रने लगा हूँ मैं 

अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें 
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं 

हर आन टूटते ये अक़ीदों के सिलसिले 

हर आन टूटते ये अक़ीदों के सिलसिले 
लगता है जैसे आज बिखरने लगा हूँ मैं 

सोचो तो बड़ी चीज़ है तहज़ीब बदन की 
वर्ना ये फ़क़त आग बुझाने के लिए हैं 

इतनों का प्यार मुझ से सँभाला न जाएगा 
लोगो तुम्हारे प्यार से डरने लगा हूँ मैं 

लहजा बना के बात करें...

लहजा बना के बात करें उन के सामने 
हम से तो इस तरह का तमाशा किया न जाए 

अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं

वो भी क्या दिन थे कि दीवाना बने फिरते थे 
सुन लिया था तिरे बारे में कहीं से हम ने 

यूँ तो एहसान हसीनों के उठाए हैं बहुत 

यूँ तो एहसान हसीनों के उठाए हैं बहुत 
प्यार लेकिन जो किया है तो तुम्हीं से हम ने 

हर एक ग़म को ख़ुशी की तरह बरतना है 
ये दौर वो है कि जीना भी इक हुनर सा लगे 

मैं सो भी जाऊँ तो क्या मेरी बंद आँखों में 
तमाम रात कोई झाँकता लगे है मुझे

ये मेरा गाँव तो पहचानता लगे है

मैं जब भी उस के ख़यालों में खो सा जाता हूँ 
वो ख़ुद भी बात करे तो बुरा लगे है मुझे  

मैं सोचता था कि लौटूंगा अजनबी की तरह 
ये मेरा गाँव तो पहचानता लगे है मुझे 

आज तो मिल के भी जैसे न मिले हों तुझ से 
चौंक उठते थे कभी तेरी मुलाक़ात से हम 

कभी पलकों पे चमकती है

कभी पलकों पे चमकती है जो अश्कों की लकीर 
सोचता हूँ तिरे आँचल का किनारा ही न हो 

चलो कि अपनी मोहब्बत सभी को बाँट आएँ 
हर एक प्यार का भूका दिखाई पड़ता है 

उम्र-भर क़त्ल हुआ हूँ मैं तुम्हारी ख़ातिर 
आख़िरी वक़्त तो सूली न चढ़ाओ यारों
8 वर्ष पहले
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Pankaj Sharma

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