समाज की पुरुष-प्रधान मान्यताओं को बीते कई दशकों से महिलाओं ने चुनौती देते हुए हर क्षेत्र में स्वयं को स्थापित किया है। कई उदाहरण ऐसे भी देखने को मिलते हैं जहाँ पुरुषों ने भी महिला विरोधी रूढ़ियों का विरोध किया और उनके समान अधिकारों की बात की। यहाँ कुछ ऐसे ही शेर मौजूद हैं जिनमें महिलाओं ने तो अपने हक़ों की आवाज़ उठाई ही है साथ ही पुरुषों ने भी उनके महत्व को समझाया है।
शहर का तब्दील होना शाद रहना और उदास
रौनक़ें जितनी यहाँ हैं औरतों के दम से है
- मुनीर नियाज़ी
ख़ुद पे ये ज़ुल्म गवारा नहीं होगा हम से
हम तो शो'लों से न गुज़़रेंगे न सीता समझें
- बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
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क़िस्सा-ए-आदम में एक और ही वहदत पैदा कर ली है
मैंने अपने अंदर अपनी औरत पैदा कर ली है
- फ़रहत एहसा
औरत हूँ मगर सूरत-ए-कोहसार खड़ी हूँ
इक सच के तहफ़्फ़ुज़ के लिए सब से लड़ी हूँ
- फ़रहत ज़ाहिद
देखूं तेरे हाथों को तो लगता है तेरे हाथ
मंदिर में फ़कत दीप जलाने के लिए हैं
- जाँ निसार अख़्तर
हिम्मत है तो बुलंद कर आवाज़ का अलम
चुप बैठने से हल नहीं होने का मसला
- ज़िया जालंधरी
औरत को समझता था जो मर्दों का खिलौना
उस शख़्स को दामाद भी वैसा ही मिला है
- तनवीर सिप्रा
मेरी हर नज़्म लड़कियों पे निसार
मेरा हर शेर औरतों के लिए
- वसीम ताशिफ़
औरत घर के चूल्हे से जल जाती है
मुझ को ऐसे ज़िंदानों से डर लगता है
- नीलमा नाहीद दुर्रानी
कहाँ औरत नहीं है सर-बरहना
कहाँ अब पर्दे का मातम नहीं है
- शौक़ बहराइची
ज़माने अब तेरे मद्द-ए-मुक़ाबिल
कोई कमज़ोर सी औरत नहीं है
- फरीहा नक़वी
ज़िंदगी औरतों को देती हैं
घर की छोटी सी खिड़कियाँ अक्सर
- अल्का मिश्रा
कौन बदन से आगे देखे औरत को
सब की आँखें गिरवी हैं इस नगरी में
- हमीदा शाहीन
आज भी औरत के हिस्से आग है
कितनी भी बेशक हों उस पे डिग्रियाँ
- किर्ति रतन सिंह
दुआ को हाथ उठाते हुए लरज़ता हूँ
कभी दुआ नहीं माँगी थी माँ के होते हुए
- इफ़्तिख़ार आरिफ़
एक मुद्दत से मेरी माँ नहीं सोई 'ताबिश'
मैंने इक बार कहा था मुझे डर लगता है
- अब्बास ताबिश
आगही कर्ब वफ़ा सब्र तमन्ना एहसास
मेरे ही सीने में उतरे हैं ये ख़ंजर सारे
- बशीर फ़ारुक़ी
मुझ में थोड़ी सी जगह भी नहीं नफ़रत के लिए
मैं तो हर वक़्त मोहब्बत से भरा रहता हूँ
- मिर्ज़ा अतहर ज़िया
बहुत कम बोलना अब कर दिया है
कई मौक़ों पे गुस्सा भी पिया है
- शम्स तबरेज़ी