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हिंदी दिवस 2019 - कुमार विश्वास की रचनाओं से चुनिंदा पंक्तियां

दीपाली अग्रवाल

Kavya Charcha
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कुमार विश्वास का नाम आज हिंदी के बड़े कविओं में शुमार होता है। वह अक्सर मंच पर तरन्नुम में अपनी कविताएं सुनाते हैं। वह अक्सर मुशायरों में भी शामिल होते हैं, कहा जा सकता है कि वह वहां हिंदी का प्रतिधिनित्व करते नज़र आते हैं। हिंदी दिवस के अवसर पर पढ़िए उनकी लिखी कविताओं से विशेष पंक्तियां 


तुम बिना हथेली की हर लकीर प्यासी है
तीर पार कान्हा से दूर राधिका-सी है
रात की उदासी को याद संग खेला है 
कुछ गलत ना कर बैठें मन बहुत अकेला है
औषधि चली आओ चोट का निमंत्रण है
बाँसुरी चली आओ, होंठ का निमंत्रण है

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सम्बन्धों को अनुबन्धों को परिभाषाएँ देनी होंगी

सम्बन्धों को अनुबन्धों को परिभाषाएँ देनी होंगी
होठों के संग नयनों को कुछ भाषाएँ देनी होंगी
हर विवश आँख के आँसू को
यूँ ही हँस हँस पीना होगा
मै कवि हूँ जब तक पीड़ा है
तब तक मुझको जीना होगा

मैं तुम्हें अधिकार दूँगा

ईश को देती चुनौती,
वारती शत-स्वर्ण मोती
अर्चना की शुभ्र ज्योति
मैं तुम्हीं पर वार दूँगा
मैं तुम्हें अधिकार दूँगा

तुम कि ज्यों भागीरथी जल
सार जीवन का कोई पल
क्षीर सागर का कमल दल
क्या अनघ उपहार दूँगा
मैं तुम्हें अधिकार दूँगा

चेहरे पर चंचल लट उलझी, आँखों मे सपन सुहाने हैं

तुमने शाने पर सिर रखकर, जब देखा फिर से एक बार
जुड़ गया पुरानी वीणा का, जो टूट गया था एक तार
फिर वही साज़ धडकन वाला फिर वही मिलन के गाने हैं
चेहरे पर चंचल लट उलझी, आँखों मे सपन सुहाने हैं

आओ हम दोनों की सांसों का एक वही आधार रहे
सपने, उम्मीदें, प्यास मिटे, बस प्यार रहे बस प्यार रहे
बस प्यार अमर है दुनिया मे सब रिश्ते आने-जाने हैं
चेहरे पर चंचल लट उलझी, आँखों मे सपन सुहाने हैं

मेरे पहले प्यार

ओ प्रीत भरे संगीत भरे!
ओ मेरे पहले प्यार!
मुझे तू याद न आया कर
ओ शक्ति भरे अनुरक्ति भरे!
नस-नस के पहले ज्वार!
मुझे तू याद न आया कर।

पावस की प्रथम फुहारों से 
जिसने मुझको कुछ बोल दिये
मेरे आँसु मुस्कानों की
कीमत पर जिसने तोल दिये

जिसने अहसास दिया मुझको 
मै अम्बर तक उठ सकता हूं
जिसने खुद को बाँधा लेकिन 
मेरे सब बंधन खोल दिये

ओ अनजाने आकर्षण से!
ओ पावन मधुर समर्पण से!
मेरे गीतों के सार 
मुझे तू याद न आया कर।

मूझे पता चला मधुरे तू भी पागल बन रोती है,
जो पीङा मेरे अंतर में तेरे दिल में भी होती है
लेकिन इन बातों से किंचिंत भी अपना धैर्य नहीं खोना
मेरे मन की सीपी में अब तक तेरे मन का मोती है,

ओ सहज सरल पलकों वाले! 
ओ कुंचित घन अलकों वाले!
हँसते गाते स्वीकार 
मुझे तू याद न आया कर।
ओ मेरे पहले प्यार 
मुझे तू याद न आया कर
6 वर्ष पहले
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