गुलज़ार के नाम से कौन नावाकिफ़ होगा, उनके लिखे गाने लोगों की ज़ुबां पर चढ़े रहते हैं। पेश हैं गुलज़ार साहब की किताब 'कुछ तो कहिए' से उनकी लिखी बेहतरीन ग़ज़ल
दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई
जैसे एहसान उतारता है कोई
आईना देख के तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई
पक गया है शज़र पे फल शायद
फिर से पत्थर उछालता है कोई
फिर नज़र में लहू के छींटे हैं
तुम को शायद मुग़ालता है कोई
देर से गूँजतें हैं सन्नाटे
जैसे हम को पुकारता है कोई
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हवा गुज़र गयी पत्ते थे कुछ हिले भी नहीं
वो मेरे शहर में आये भी और मिले भी नहीं
ये कैसा रिश्ता हुआ इश्क में वफ़ा का भला
तमाम उम्र में दो चार छ: गिले भी नहीं
इस उम्र में भी कोई अच्छा लगता है लेकिन
दुआ-सलाम के मासूम सिलसिले भी नहीं
उधड़ी सी किसी फ़िल्म का एक सीन थी बारिश
इस बार मिली मुझसे तो ग़मगीन थी बारिश
कुछ लोगों ने रंग लूट लिए शहर में इस के
जंगल से जो निकली थी वो रंगीन थी बारिश
रोई है किसी छत पे, अकेले ही में घुटकर
उतरी जो लबों पर तो वो नमकीन थी बारिश
ख़ामोशी थी और खिड़की पे इक रात रखी थी
बस एक सिसकती हुई तस्कीन थी बारिश
दर्द हल्का है साँस भारी है
जिए जाने की रस्म जारी है
आप के बाद हर घड़ी हम ने
आप के साथ ही गुज़ारी है
रात को चाँदनी तो ओढ़ा दो
दिन की चादर अभी उतारी है
शाख़ पर कोई क़हक़हा तो खिले
कैसी चुप सी चमन पे तारी है
कल का हर वाक़िआ तुम्हारा था
आज की दास्ताँ हमारी है
क्या बताएं कि जां गयी कैसे
फिर से दोहराएं वो घड़ी कैसे
किसने रास्ते मे चांद रखा था
मुझको ठोकर लगी कैसे
वक़्त पे पांव कब रखा हमने
ज़िंदगी मुंह के बल गिरी कैसे
आंख तो भर आयी थी पानी से
तेरी तस्वीर जल गयी कैसे
हम तो अब याद भी नहीं करते
आप को हिचकी लग गई कैसे