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गोपाल दास नीरज: अब रीति सागर का क्या होगा...

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
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                                                  प्रेम गीतों के सरताज गोपाल दास नीरज ने मूल रूप से प्रेम के गुलशन को ही अपनी काव्य प्रतिभा से महकाया है। प्रेम का भाव समाज के सभी दंशों को अपने में समोए रहता है। लिहाजा नीरज के गम भरे गीतों में समाज की अन्य कुरीतियों पर भी प्रहार हुआ है। नीरज हमेशा उजाले की बात कहते हैं। वह समाज की कमियों को दूर करने के लिए लालायित रहते हैं। काव्य चर्चा में इस बार हम नीरज की इस कविता के जरिए उनका सामाजिक दर्शन जाहिर कर रहे हैं।

माखन चोरी कर तूने कम तो
कर दिया बोझ ग्वालिन का
लेकिन मेरे श्याम बता
अब रीति सागर का क्या होगा?

    युग-युग चली उमर की मथनी,
    तब झलकी घट में चिकनाई,
    पीर-पीर जब साँस उठी जब
    तब जाकर मटकी भर पाई,
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पलक मारते लूट ले गयी...

एक कंकड़ी तेरे कर की
    किन्तु न जाने आ किस दिशि से
    पलक मारते लूट ले गयी
    जनम-जनम की सकल कमाई
पर है कुछ न शिकायत तुझसे, केवल इतना ही बतला डे,
मोती सब चुग गया हंस तब मानसरोवर का क्या होगा?
    माखन चोरी कर तूने...

    सजने से तो सज आती है
    मिट्टी हर घर एक रतन से,
    शोभा होती किन्तु और ही
    मटकी की टटके माखन से,

निर्मित हो चाहे कंचन से...

इस द्वारे से उस द्वारे तक,
    इस पनघट से उस पनघट तक
    रीता घट है बोझ धरा पर
    निर्मित हो चाहे कंचन से,
फिर भी कुछ न मुझे दुःख अपना, चिंता यदि कुछ है तो यह है,
वंशी धुनी बजाएगा जो, उस वंशीधर का क्या होगा?
    माखन चोरी कर तूने...

    दुनिया रस की हाट सभी को
    ख़ोज यहाँ रस की क्षण-क्षण है,
    रस का ही तो भोग जनम है
    रस का हीं तो त्याग मरण है,
 

नवनीत ह्रदय का...

और सकल धन धूल, सत्य
    तो धन है बस नवनीत ह्रदय का,
    वही नहीं यदि पास, बड़े से
    बड़ा धनी फिर तो निर्धन है,
अब न नचेगी यह गूजरिया, ले जा अपनी कुर्ती-फरिया,
रितु ही जब रसहीन हुई तो पंचरंग चूनर का क्या होगा?
    माखन चोरी कर तूने...

    देख समय हो गया पैंठ का
    पथ पर निकल पड़ी हर मटकी
    केवल मैं ही निज देहरी पर
    सहमी-सकुची, अटकी-भटकी,
 

गोकुल आऊँ...

पता नहीं जब गोरस कुछ भी
    कैसे तेरे गोकुल आऊँ ?
    कैसे इतनी ग्वालनियों में
    लाज बचाऊँ अपने घट की ,
या तो इसको फिर से भर डे या इसके सौ टुकड़े कर दे,
निर्गुण जब हो गया सगुण तब इस आडम्बर का क्या होगा?
    माखन चोरी कर तूने...

    जब तक थी भरपूर मटकिया
    सौ-सौ चोर खड़े थे द्वारे,
    अनगिन चिंताएँ थी मन में
    गेह खड़े थे लाख किवाड़े

परवाह नहीं इतनी भी...

किन्तु कट गई अब हर साँकल
    और हो गई हल हर मुश्किल,
    अब परवाह नहीं इतनी भी
    नाव लगे किस नदी किनारे,
सुख-दुःख हुए समान सभी, पर एक प्रश्न फिर भी बाक़ी है
वीतराग हो गया मनुज तो, बूढ़े ईश्वर का क्या होगा?
    माखन चोरी कर तूने...
8 वर्ष पहले
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