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माखनलाल चतुर्वेदी - 'पुष्प की अभिलाषा' उनके निजी जीवन का सार है

deepali agrawal

Kavya Charcha
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मुझे तोड़ लेना बनमाली, 
उस पथ पर देना तुम फेंक 
मातृ-भूमि पर शीश-चढ़ाने, 
जिस पथ पर जावें वीर अनेक 

कवि के व्यक्तित्व को बहुत सीमा तक उसके द्वारा लिखे काव्य से समझा जा सकता है। हिंदी हैं हम की श्रृंखला में आज हम बात करेंगे उक्त पंक्तियों को लिखने वाले महाकवि माखनलाल चतुर्वेदी के बारे में। 

माखनलाल चतुर्वेदी की लिखी इन पंक्तियों से यह जाना जा सकता है कि वह ‘पुष्प की अभिलाषा’ के माध्यम से अपने अंतस की बात कह रहे हैं।
मातृभूमि के लिए उनकी यह भावना मात्र कविताओं तक ही सीमित नहीं है, माखनलाल चतुर्वेदी ने महात्मा गांधी द्वारा आहूत सन 1920 के 'असहयोग आंदोलन' में महाकोशल अंचल से पहली गिरफ्तारी दी थी। सन् 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी वह गिरफ़्तार हुए। कवि, लेखक और पत्रकार माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म 4 अप्रैल 1889 को मध्य-प्रदेश के होशंगाबाद में हुआ था।

शुरुआती दौर में शिक्षक के तौर पर काम करने वाले माखनलाल चतुर्वेदी ने बाद में प्रभा और कर्मवीर जैसे पत्रों का संपादन किया। इन्हीं पत्रों के माध्यम से उन्होंने गुलाम भारत को झकझोंरा और ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध आवाज़ बुलंद की।

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जिन दिनों जन-जन में स्वदेशी के लिए आह्वान किया जा रहा था, उसी समय माधवराव सप्रे के 'हिन्दी केसरी' ने सन 1908 में 'राष्ट्रीय आंदोलन और बहिष्कार' विषय पर निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया। खंडवा के युवा अध्यापक माखनलाल चतुर्वेदी का निबंध प्रथम चुना गया। इसके बाद सितंबर 1913 में उन्होंने अध्यापक की नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह पत्रकारिता, साहित्य और राष्ट्रीय आंदोलन के लिए समर्पित हो गए। उन्हीं दिनों माखनलाल ने गणेशशंकर विद्यार्थी के साथ मैथिलीशरण गुप्त और महात्मा गांधी से मुलाकात की। 

'पुष्प की अभिलाषा' और 'अमर राष्ट्र' जैसी ओजस्वी रचनाओं के रचयिता इस महाकवि के कृतित्व को सागर विश्वविद्यालय ने 1959 में डी.लिट्. की मानद उपाधि से विभूषित किया। 1963 में भारत सरकार ने उन्हें 'पद्मभूषण' से अलंकृत किया जिसे उन्होंने राष्ट्रभाषा हिन्दी पर आघात करने वाले राजभाषा संविधान संशोधन विधेयक के विरोध में लौटा दिया। उनके काव्य संग्रह 'हिमतरंगिणी' के लिये 1955 में हिन्दी के 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' से सम्मानित किया गया।
पढ़ें उनकी लिखी रचनाएं 

पुष्प की अभिलाषा

चाह नहीं, मैं सुरबाला के
गहनों में गूंथा जाऊं,
चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध
प्यारी को ललचाऊं,
चाह नहीं सम्राटों के शव पर
हे हरि डाला जाऊं,
चाह नहीं देवों के सिर पर
चढूं भाग्य पर इठलाऊं,
मुझे तोड़ लेना बनमाली,
उस पथ पर देना तुम फेंक!
मातृ-भूमि पर शीश- चढ़ाने,
जिस पथ पर जावें वीर अनेक

वरदान या अभिशाप?

कौन पथ भूले, कि आए
स्नेह मुझसे दूर रहकर
कौन से वरदान पाए?

यह किरन-वेला मिलन-वेला
बनी अभिशाप होकर,
और जागा-जग, सुला
अस्तित्व अपना पाप होकर;
छलक ही उट्ठे, विशाल !
न उर-सदन में तुम समाए।

उठ उसांसों ने, सजन,
अभिमानिनी बन गीत गाये,
फूल कब के सूख बीते,
शूल थे मैंने बिछाये।

शूल के अमरत्व पर
बलि फूल कर मैंने चढ़ाये,
तब न आये थे मनाये
कौन पथ भूले, कि आये

संध्या के बस दो बोल सुहाने लगते हैं

संध्या के बस दो बोल सुहाने लगते हैं
सूरज की सौ-सौ बात नहीं भाती मुझको

बोल-बोल में बोल उठी मन की चिड़िया
नभ के ऊंचे पर उड़ जाना है भला-भला
पंखों की सर-सर कि पवन की सन-सन पर
चढ़ता हो या सूरज होवे ढला-ढला 

यह उड़ान, इस बैरिन की मनमानी पर
मैं निहाल, गति स्र्द्ध नहीं भाती मुझको।
संध्या के बस दो बोल सुहाने लगते हैं
सूरज की सौ-सौ बात नहीं भाती मुझको।

सूरज का संदेश उषा से सुन-सुनकर
गुन-गुनकर, घोंसले सजीव हुए सत्वर
छोटे-मोटे, सब पंख प्रयाण-प्रवीण हुए
अपने बूते आ गये गगन में उतर-उतर

ये कलरव कोमल कण्ठ सुहाने लगते हैं
वेदों की झंझावात नहीं भाती मुझको।
संध्या के बस दो बोल सुहाने लगते हैं
सूरज की सौ-सौ बात नहीं भाती मुझको।

जीवन के अरमानों के काफिले कहीं, ज्यों
आंखों के आंगन से जी घर पहुंच गये
बरसों से दबे पुराने, उठ जी उठे उधर
सब लगने लगे कि हैं सब ये बस नये-नये

जूएं की हारों से ये मीठे लगते हैं
प्राणों की सौ सौगा़त नहीं भाती मुझको।
संध्या के बस दो बोल सुहाने लगते हैं
सूरज की सौ-सौ बात नहीं भाती मुझको।

ऊषा-संध्या दोनों में लाली होती है
बकवासनि प्रिय किसकी घरवाली होती है
तारे ओढ़े जब रात सुहानी आती है
योगी की निस्पृह अटल कहानी आती है।

नीड़ों को लौटे ही भाते हैं मुझे बहुत
नीड़ो की दुश्मन घात नहीं भाती मुझको।
संध्या के बस दो बोल सुहाने लगते हैं
सूरज की सौ-सौ बात नहीं भाती मुझको।
6 वर्ष पहले
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