मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्म 'हम देखेंगे' इन दिनों विवाद में है, इस नज़्म पर आरोप है कि यह सांप्रदायिक है और इसे कटघरे में खड़ा कर दिया गया है। फ़ैसले के लिए आईआईटी कानपुर को चुना गया है। उनके द्वारा एक समिति का गठन किया गया है जो यह बताएगी कि इस नज़्म पर लगे आरोप ठीक हैं या शायर को इससे बरी किया सकता है।
इसकी शुरुआत पाकिस्तान से हुई जब तत्कालीन ज़िया-उल-हक़ की सरकार द्वारा साड़ी को बैन कर दिया गया था। तब सन् 1986 में इक़बाल बानो ने लगभग 50,000 लोगों की भीड़ के सामने साड़ी में यह नज़्म गायी थी। जैसे ही इसकी पंक्ति आयी 'सब ताज उछाले जाएंगे, सब तख़्त गिराए जाएंगे' वैसे ही खचाखच भरे उस हॉल में 'इंक़लाब ज़िंदाबाद' के ख़ूब नारे लगे। तब से यह नज़्म सरकार का विरोध करने वालों की आवाज़ बन गयी।
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13 फरवरी 1911 को पाकिस्तान में पैदा हुए फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ एक मार्क्सवादी शायर थे जिन्हें उर्दू और हिंदी दोनों ही ज़ुबान के लोगों से बहुत मुहब्बत मिली। उनके कहे में जितना इंक़लाब है उतनी ही रूमानियत भी है। अकादमिक परिवेश में पले-बढ़े फ़ैज़ ने बचपन से ही अपने घर में कवियों व लेखकों के जमावड़े को देखा था। पिता उन्हेें इस्लाम का विद्वान बनाना चाहते थे; बचपन में ही उन्होंने अरबी, फ़ारसी और उर्दू सीख ली थी। अरबी में ही स्नातक भी किया और आगे की शिक्षा अंग्रेज़ी साहित्य में ली। कॉलेज के दिनों में ही वह साम्यवाद से प्रभावित हो गए थे। उन्होंने समाज के पिछड़े व शोषित लोगों की आवाज़ को उठाना शुरु किया।
फ़ैज़ ने कुछ वक़्त के लिए ब्रिटिश आर्मी में भी अपनी सेवा दी। 1947 के बंटवारे के बाद वह पाकिस्तान रहे लेकिन कश्मीर के युद्ध के बाद उन्होंने आर्मी से इस्तीफ़ा दे दिया। 1948 में वह पाकिस्तान टाइ्म्स के संपादक हो गए। फ़ैज़ की पहचान एक क्यूनिस्ट के तौर पर प्रचलित हुई, उन्होंने सज्जाद ज़हीर के साथ मिलकर पाकिस्तान कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना भी की थी। हालांकि इस पार्टी पर बाद में प्रतिबंध लगा दिया गया और पूरी साजिशों के साथ इसके नेताओं की गिरफ़्तारी की गयी। जिनमें सज्जाद ज़हीर और फ़ैज़ दोनों शामिल थे।
फ़ैज़ को 4 साल जेल की सज़ा सुनाई गयी जिसे प्रधानमंत्री हुसैन सुहरावर्दी द्वारा कम कर दिया गया। इसके बाद फ़ैज़ लंदन चले गए। कुछ वक़्त बाद वह वापस पाकिस्तान आए तो उन्हें फिर से राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्ज़ा द्वारा गिरफ़्तार किया गया। इस गिरफ़्तारी से छूटने के बाद वह मॉस्को गए और फिर लंदन में जाकर रहने लगे। 1964 में फ़ैज़ फिर आए और कराची में बस गए। उन्होंने ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की सरकार में शिक्षा और संस्कृति मंत्रालय में काम किया।
लेकिन 1977 में ज़िया-उल-हक़ ने सरकार का तख़्तापलट कर दिया। इससे फ़ैज़ बेहद निराश हुए और ज़िया सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ उन्होंने लिखना शुरु किया। नज़्म 'हम देखेंगे' भी इसी दौरान लिखी गयी थी।
फ़ैज़ के लेखन में दबे-कुचले, मज़लूम लोगों के स्वर ही सुनाई देते हैं। उन्हें नोबल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था और सोवियत संघ द्वारा लेनिन शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
हम देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिस का वादा है
जो लौह-ए-अज़ल में लिख्खा है
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिरां
रूई की तरह उड़ जाएंगे
हम महकूमों के पांव-तले
जब धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हकम के सर-ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएंगे
हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएंगे
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख़्त गिराए जाएंगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ाएब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर भी
उट्ठेगा अनल-हक़ का नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज करेगी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
ये दाग़ दाग़ उजाला ये शब-गज़ीदा सहर
वो इंतिज़ार था जिस का ये वो सहर तो नहीं
कटते भी चलो बढ़ते भी चलो बाज़ू भी बहुत हैं सर भी बहुत
चलते भी चलो कि अब डेरे मंज़िल ही पे डाले जाएंगे
उन्हीं के फ़ैज़ से बाज़ार-ए-अक़्ल रौशन है
जो गाह गाह जुनूं इख़्तियार करते रहे
हर सदा पर लगे हैं कान यहां
दिल संभाले रहो ज़बां की तरह
'फ़ैज़' थी राह सर-ब-सर मंज़िल
हम जहां पहुंचे कामयाब आए