साहित्य और सियासत का एक दूसरे से गहरा संबंध है। सियासी उथल-पुथल हमेशा से कवि व लेखकों को कलम उठाने के लिए मजबूर कर देती है। इसलिए शायरों ने सियासत पर ख़ूब नज़्में लिखी।
मज़हब और सियासत
दोनों
नए नए नारे रटते हैं
बहुत से शहरों
बहुत से मुल्कों से
अब चल कर
नज़्म मेरे घर जब आती है
इतनी ज़ियादा थक जाती है
मेरे लिखने की टेबल पर
ख़ाली काग़ज़ को
ख़ाली ही छोड़ के रुख़्सत हो जाती है
- निदा फ़ाज़ली
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सियासत की फ़ुसूँ-साज़ी
तिजारत की ज़ियाँ-कारी
हवस की गर्म-बाज़ारी
किसी अय्यार-ए-क़ुव्वत की जहाँ-दारी
में दम घुटता है
- साजिदा ज़ैदी
अदब के साथ सियासत भी नश्र करती थी
मुशायरों में ब-सद एहतिराम आती थी
यही बयाज़ मुसीबत में काम आती थी
इसी बयाज़ से दोहों को आज़माना था
वो शाख़ ही न रही जिस पे आशियाना था
फिर इक ज़रिया सियासत है नाम पाने का
अलावा नाम के मोहरे बना के लोगों को
बिसात-ए-अर्ज़ पे शतरंज खेल सकते हैं
मगर ये फ़न भी मिरी दस्तरस से बाहर था
फिर और क्या हो बहुत कुछ ख़याल दौड़ाया
अलावा इन के मुझे और कुछ नहीं सूझा