विज्ञापन

चुनाव के मौसम में पढ़ें ये नज़्में

दीपाली अग्रवाल

Kavya Charcha
विज्ञापन
                                    
                     
                                                  

साहित्य और सियासत का एक दूसरे से गहरा संबंध है। सियासी उथल-पुथल हमेशा से कवि व लेखकों को कलम उठाने के लिए मजबूर कर देती है। इसलिए शायरों ने सियासत पर ख़ूब नज़्में लिखी।
 

मज़हब और सियासत
दोनों
नए नए नारे रटते हैं
बहुत से शहरों
बहुत से मुल्कों से
अब चल कर
नज़्म मेरे घर जब आती है
इतनी ज़ियादा थक जाती है
मेरे लिखने की टेबल पर
ख़ाली काग़ज़ को
ख़ाली ही छोड़ के रुख़्सत हो जाती है

- निदा फ़ाज़ली

विज्ञापन

सियासत की फ़ुसूँ-साज़ी
तिजारत की ज़ियाँ-कारी
हवस की गर्म-बाज़ारी
किसी अय्यार-ए-क़ुव्वत की जहाँ-दारी
में दम घुटता है

- साजिदा ज़ैदी

खालिद इरफ़ान

अदब के साथ सियासत भी नश्र करती थी
मुशायरों में ब-सद एहतिराम आती थी
यही बयाज़ मुसीबत में काम आती थी
इसी बयाज़ से दोहों को आज़माना था
वो शाख़ ही न रही जिस पे आशियाना था

अख़्तर-उल-ईमान

फिर इक ज़रिया सियासत है नाम पाने का
अलावा नाम के मोहरे बना के लोगों को
बिसात-ए-अर्ज़ पे शतरंज खेल सकते हैं
मगर ये फ़न भी मिरी दस्तरस से बाहर था
फिर और क्या हो बहुत कुछ ख़याल दौड़ाया
अलावा इन के मुझे और कुछ नहीं सूझा

7 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dn Chaubey

7364 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

13069 कविताएं

View Profile