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'अकेलेपन' और दर्द ए तन्हाई पर ये हैं 10 चुनिंदा शेर...

रत्नेश मिश्र

Kavya Charcha
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                                                  'तन्हाई' कविता और शायरी में ज़्यादातर महबूब से अलगाव के परिणाम के रूप में आती है। लेकिन अकेलापन ऐसी बीमारी है कि किसी भी रूप में हमारे सामने आ सकती है। पेश है अकेलेपन पर शायरों के चुनिंदा अशआर....


एक महफ़िल में कई महफ़िलें होती हैं शरीक 
जिस को भी पास से देखोगे अकेला होगा 
~निदा फ़ाज़ली

अब इस घर की आबादी मेहमानों पर है 
कोई आ जाए तो वक़्त गुज़र जाता है 
~ज़ेहरा निगाह
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अकेले-पन भी हमारा ये दूर करती है
कि रख के देखो ज़रा अपने पास तस्वीरें
~दिनेश कुमार

सूने घरों में रहने वाले कुंदनी चेहरे कहते हैं
सारी सारी रात अकेले-पन की आग जलाती है
~सहबा अख़्तर

किसी हालत में भी तन्हा नहीं होने देती 
है यही एक ख़राबी मिरी तन्हाई की 
~फ़रहत एहसास

ख़्वाब की तरह बिखर जाने को जी चाहता है 
ऐसी तन्हाई कि मर जाने को जी चाहता है 
~इफ़्तिख़ार आरिफ़

अकेले-पन का 'अज़्मी' हो भी तो एहसास कैसे हो
तसलसुल से हमारी शाम-ए-तन्हाई सफ़र में है
~इस्लाम उज़्मा

भीड़ के ख़ौफ़ से फिर घर की तरफ़ लौट आया 
घर से जब शहर में तन्हाई के डर से निकला 
~अलीम मसरूर

मेरे मरने पर किसी को ज्यादा फर्क नहीं होगा,
बस तन्हाई रोएगी कि मेरा हमसफ़र चला गया
~अज्ञात 

कोसते रहते हैं अपनी जिंदगी को उम्रभर
भीड़ में हंसते हैं मगर तन्हाई में रोया करते हैं
~अज्ञात 
7 वर्ष पहले
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