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मासूम बचपन और ये 20 बड़े शेर....

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
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                                                  लड़कपन में धूल-मिट्टी में खेलना, मिट्टी मुंह पर लगाना, मिट्टी में लेट जाना किसे नहीं याद है?  किसे यह याद नहीं है कि इसके बाद मां की प्यारभरी डांट-फटकार व रुंआसे होने पर प्यार भरा स्पर्श ! किसी भी लेखक या साहित्यकार से पूछ लीजिए। खासकर उससे जो बच्चों के लिए लिखता हो, हर कोई कहेगा कि बच्चों के लिए लिखना बहुत कठिन है, इसके बावजूद लिखा खूब गया है। शेरों-शाइरी की श्रृंखला में आज हम पाठकों के लिए पेश कर रहे हैं 'बचपन' पर शायरों के अल्फ़ाज- 

मेरे दिल के किसी कोने में, एक मासूम सा बच्चा
बड़ों की देख कर दुनिया, बड़ा होने से डरता है
 - राजेश रेड्डी

हज़ारों शेर मेरे सो गये काग़ज़ की क़ब्रों में
अजब माँ हूं कोई बच्चा मेरा ज़िन्दा नहीं रहता 
- बशीर बद्र
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मेरा बचपन भी साथ ले आया

मेरा बचपन भी साथ ले आया
गांव से जब भी आ गया कोई
- कैफ़ी आज़मी

कोई स्कूल की घंटी बजा दे
ये बच्चा मुस्कुराना चाहता है 
- शकील जमाली 

बचपन का हर नन्हा सपना
थक कर बूढ़ा हो कर लौटा
-अनिल अभिषेक

दूर मुझसे हो गया बचपन मगर

अपने बच्चों को मैं बातों में लगा लेता हूं
जब भी आवाज़ लगाता है खिलौने वाला 
- राशिद राही

दूर मुझसे हो गया बचपन मगर
मुझमें बच्चे सा मचलता कौन है
- राजेन्द्र कलकल

जिसने मेरे बचपन की पदचाप सुनी
अपने घर का ऐसा कोना हाथ लगा
- आनंद बहादुर

भूख चेहरों पे लिए चांद से प्यारे बच्चे 

खिलौनों के लिए बच्चे अभी तक जागते होंगे
तुझे ऐ मुफ़लिसी बहाना ढूंढ लेना है 
- मुनव्वर राना

जब भी मुझको अपना बचपन याद आता है
बचपन के इक प्यार का बचपन याद आता है
- क़ैसर सिद्दीक़ी

भूख चेहरों पे लिए चांद से प्यारे बच्चे 
बेचते फिरते हैं गलियों में ग़ुब्बारे बच्चे 
- बेदिल हैदरी

छाछ फूंकें कि अपने बचपन में

बच्चों के छोटे हाथों को चांद सितारे छूने दो 
चार किताबें पढ़कर ये भी हम जैसे हो जाएंगे 
- निदा फ़ाज़ली

छाछ फूंकें कि अपने बचपन में
दूध से किस तरह जले हैं हम
- जावेद अख़्तर

झूठ बोलते थे फिर भी कितने सच्चे थे हम
ये उन दिनों की बात है जब बच्चे थे हम

अब तक हमारी उम्र का बचपन नहीं गया

बचपन में आकाश को छूता सा लगता था
इस पीपल की शाख़ें अब कितनी नीची हैं
- मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

तूफ़ानी बारिश घर में सैलाब का आलम
ठंडा चूल्हा भूखा बचपन याद आता है
- क़ैसर सिद्दीक़ी

अब तक हमारी उम्र का बचपन नहीं गया
घर से चले थे जेब के पैसे गिरा दिए
- नश्तर ख़ानक़ाही

अपनी-अपनी ज़िद पे अड़ने को हुए बच्चे

महंगे खिलौने दे न सका मैं ये मेरी लाचारी है
लेकिन मेरी बच्ची मुझको जां से ज़्यादा प्यारी है 
- अतुल अजनबी 

दुःख का पहला पाठ पढ़ाया ग़ुरबत ने
कल बच्चे ने छुआ नहीं गुब्बारे को
 - शकील जमाली

अपनी-अपनी ज़िद पे अड़ने को हुए बच्चे जवां
और बुज़ुर्गों का मकां नादानियों में बंट गया
 - वसीम बरेलवी 
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