कितना आसान था बचपन में सुलाना हम को
नींद आ जाती थी परियों की कहानी सुन कर
-भारत भूषण पन्त
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सबब ख़ामोशियों का मैं नहीं था
मिरे घर में सभी कम बोलते थे
-भारत भूषण पन्त
एक जैसे लग रहे हैं अब सभी चेहरे मुझे
होश की ये इंतिहा है या बहुत नश्शे में हूँ
-भारत भूषण पन्त
अब तो इतनी बार हम रस्ते में ठोकर खा चुके
अब तो हम को भी वो पत्थर देख लेना चाहिए
- भारत भूषण पन्त