रास्ता यानी जिस पर चलकर अपनी मंज़िल तक पहुंचा जाता है। हर व्यक्ति एक सफ़र में है और एक रास्ते से गुज़र रहा है। इसमें उसे कई तजुर्बात भी होते हैं। शायरों ने ज़िंदगी में रास्ते को किस तरह से देखा, जानें इन शायरी के सा
मैं तो चलता हूँ तेरी याद के साथ
रास्ता मेरे साथ चलता है
- लतीफ़ साहिल
हर मुसाफ़िर के साथ आता है
इक नया रास्ता हमेशा से
- ताजदार आदिल
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रास्ता आगे भी ले जाता नहीं
लौट कर जाना भी मुश्किल हो गया
- जलील ’आली’
कूचा-ए-यार जो न जाता हो
रास्ता रास्ता नहीं होता
- इब्न-ए-मुफ़्ती
तेरा अपना रास्ता था मेरा अपना रास्ता
इस पे भी ऐ ज़िंदगी तुझ को बसर मैं ने किया
- सिद्दीक़ शाहिद
मेरा रास्ता तेरे रास्ते से अलग हुआ
यही रास्ता था बचा हुआ मेरे सामने
- इनाम नदीम
निकल आए किधर मंज़िल की धुन में
यहाँ तो रास्ता ही रास्ता है
- निदा फ़ाज़ली
सामने जब कोई मंज़िल ही नहीं
रास्ता रोज़ बदलना होगा
- ख़लिश देहलवी
सोचते रहने से तो मंज़िल कभी मिलती नहीं
चलते जाओ रास्ते से रास्ता मिल जाएगा
- बाक़ी अहमदपुरी
कारवाँ रास्ते में चलते रहे
रास्ता चुप रहा हमेशा से
- ताजदार आदिल
सफ़र में अब के अजब तजरबा निकल आया
भटक गया तो नया रास्ता निकल आया
- राजेश रेड्डी
उस ने यूँ रास्ता दिया मुझ को
रास्ते से हटा दिया मुझ को
- अक्स समस्तीपूरी