अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
तुम हमारे किसी तरह न हुए
वर्ना दुनिया में क्या नहीं होता
- मोमिन ख़ाँ मोमिन
हम को न मिल सका तो फ़क़त इक सुकून-ए-दिल
ऐ ज़िंदगी वगर्ना ज़माने में क्या न था
- आज़ाद अंसारी
ज़ोर क़िस्मत पे चल नहीं सकता
ख़ामुशी इख़्तियार करता हूँ
- अज़ीज़ हैदराबादी
दौलत नहीं काम आती जो तक़दीर बुरी हो
क़ारून को भी अपना ख़ज़ाना नहीं मिलता
- मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
हर फ़िक्र सिर्फ़ जागने वाले का है नसीब
जो सो रहा है बस वही बंदा मज़े में है
- अन्जुमन मंसूरी आरज़ू
जग में आ कर इधर उधर देखा
तू ही आया नज़र जिधर देखा
- ख़्वाजा मीर दर्द
Urdu Poetry: 'मीर' बंदों से काम कब निकला