वाणी प्रकाशन से प्रकाशित किताब 'धूप जनवरी की फूल दिसम्बर के' से आपके लिए चुनिंदा शेर
भला हुआ कि कोई और मिल गया तुम सा
वरगना हम भी किसी दिन तुम्हें भुला देते
- ख़लीलुर्रहमान आज़मी
अजीब शख़्स है नाराज़ हो के हँसता है
मैं चाहता हूँ ख़फ़ा हो तो वो ख़फ़ा ही लगे
- बशीर बद्र
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शाद को क्या बर्बाद करोगे
लो दिल लो क्या याद करोगे
- असर लखनवी
अब थकन पाँव की ज़ंजीर बनी जाती है
राह का ख़ौफ़ ये कहता है कि चलते रहिए
- मेराज फ़ैज़ाबादी
जैसा दर्द हो वैसा मंज़र होता है
मौसम तो इंसान के अंदर होता है
- अज़ीज़ एज़ाज़
हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
वक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं तोड़ा करते
- गुलज़ार
ये दोस्ती ये मरासिम ये चाहतें ये ख़ुलूस
कभी कभी मुझे सब कुछ अजीब लगता है
- जाँ निसार अख़्तर
ये हुनर भी बड़ा ज़रूरी है
कितना झुक कर किसे सलाम करो
- हफ़ीज़ मेरठी
बुलन्दियों से गिरोगे तो टूट जाओगे
ज़बाँ से अपनी बड़ा बोल बोलते क्यूँ हो
- महबूब राही
चाहतों भरे कमरे दिल खुले खुले आँगन
अब तो ढूँढ़े पे भी ऐसे घर नहीं मिलते
- रऊफ़ ख़लिश