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आज का लफ़्ज़- बयाबान

दीपाली अग्रवाल

Kavya Charcha
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कई बार ज़िंदगी में ऐसी स्थिति आ जाती है जब सब कुछ बहुत बेगाना लगता है। इसी को कहते हैं कि ज़िंदगी वीरान हो गयी है। मानो सब कुछ ही बयाबान हो। मंज़िल के रास्तों से लेकर, शहर तक सब कुछ बयाबान लगता है यानी वीरान लगता है। जब शायरों का सामना ऐसी स्थिति से हुआ तो उन्होंने अपने अशआर यूं लिखे। 
 

क़िस्मत की ख़राबी है कि जाता हूँ ग़लत सम्त
पड़ता है बयाबान बयाबान से आगे
- एजाज़ गुल


न कोई फूल ही रखा न आरज़ू न चराग़
तमाम घर को बयाबान कर दिया मैं ने
- ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र

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ये वस्ल की रुत है कि जुदाई का है मौसम
ये गुलशन-ए-दिल है कि बयाबान कहीं का
- इफ़्तिख़ार राग़िब


जिस जगह जाएँ बना लें तिरे वहशी सहरा
ख़ाक ले आए हैं मुट्ठी में बयाबानों की
- जावेद लख़नवी

सैकड़ों चाक नज़र आने लगे दामन में
ले जुनूँ खुल गईं राहें ये बयाबानों की
- जलील मानिकपूरी


तेरा दीवाना तो वहशत की भी हद से निकला
कि बयाबाँ को भी चाहे है बयाबाँ होना
- ग़ुलाम मौला क़लक़

छाई जाती है ये वहशत कैसी
घर बयाबान हुआ जाता है
- दाग़ देहलवी


'ज़फ़र' मैं शहर में आ तो गया हूँ
मिरी ख़सलत बयाबानी रहेगी
- ज़फ़र इक़बाल

दिल बयाबानी साथ रखता है
आँख बरसात छोड़ जाती है
- फ़रहत अब्बास शाह


इंतिक़ाम ऐसा लिया है मिरी तन्हाई ने
शहर का शहर बयाबाना बना रक्खा है
- फ़रहत एहसास

7 वर्ष पहले
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