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चाहे सभी सुमन बिक जाएं... पर अपनी गंध नहीं बेचूंगा -बालकवि बैरागी

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
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                                                  बैरागी राजनीति एवं साहित्य दोनों से जुड़े रहे। मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री तथा लोकसभा के सदस्य भी रहे। इनकी कविताओं में साहित्य और राजनीति की झलक मिलती है। इनका जन्म मंदसौर जिले की मनासा तहसील के रामपुर गांव में 10 फ़रवरी 1931 को हुआ। गीत, दरद दीवानी, दो टूक, भावी रक्षक देश के, आओ बच्चों गाओ बच्चों इनकी रचनाएं हैं।

चाहे सभी सुमन बिक जाएं
चाहे ये उपवन बिक जाएं
चाहे सौ फागुन बिक जाएं
पर मैं गंध नहीं बेचूंगा-अपनी गंध नहीं बेचूंगा...
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लक्ष्मण जैसी चौकी देकर जिन कांटों ने जान बचाई...

जिस डाली ने गोद खिलाया जिस कोंपल ने दी अरुणाई
लक्ष्मण जैसी चौकी देकर जिन कांटों ने जान बचाई
इनको पहिला हक आता है चाहे मुझको नोचें तोड़ें
चाहे जिस मालिन से मेरी पांखुरियों के रिश्ते जोड़ें

ओ मुझ पर मंडराने वालों
मेरा मोल लगाने वालों
जो मेरा संस्कार बन गई वो सौगंध नहीं बेचूंगा
अपनी गंध नहीं बेचूंगा- चाहे सभी सुमन बिक जाएं

कोमल भंवरों के सुर सरगम पतझरों का रोना-धोना...

मौसम से क्या लेना मुझको ये तो आएगा-जाएगा
दाता होगा तो दे देगा  खाता होगा तो खाएगा
कोमल भंवरों के सुर सरगम पतझरों का रोना-धोना
मुझ पर क्या अंतर लाएगा पिचकारी का जादू-टोना
ओ नीलम लगाने वालों
पल-पल दाम बढ़ाने वालों
मैंने जो कर लिया स्वयं से वो अनुबंध नहीं बेचूंगा
अपनी गंध नहीं बेचूंगा-चाहे सभी सुमन बिक जाएं।

भूल-चूक की माफी लेगी सबसे मेरी गंध कुमारी...

मुझको मेरा अंत पता है पंखुरी-पंखुरी झर जाऊंगा
लेकिन पहिले पवन-परी संग एक-एक के घर जाऊंगा
भूल-चूक की माफी लेगी सबसे मेरी गंध कुमारी
उस दिन ये मंडी समझेगी किसको कहते हैं खुद्दारी
बिकने से बेहतर मर जाऊं अपनी माटी में झर जाऊं
मन ने तन पर लगा दिया जो वो प्रतिबंध नहीं बेचूंगा
अपनी गंध नहीं बेचूंगा- चाहे सभी सुमन बिक जाएं।

सूरज जिसका सर सहलाए उसके सर को नीचा कर दूं?

मुझसे ज्यादा अहं भरी है ये मेरी सौरभ अलबेली
नहीं छूटती इस पगली से नीलगगन की खुली हवेली
सूरज जिसका सर सहलाए उसके सर को नीचा कर दूं?
ओ प्रबंध के विक्रेताओं
महाकाव्य के ओ क्रेताओं
ये व्यापार तुम्हीं को शुभ हो मुक्तक छंद नहीं बेचूंगा
अपनी गंध नहीं बेचूंगा- चाहे सभी सुमन बिक जाएं।
8 वर्ष पहले
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